पारस्परिक समन्वय-सामंजस्य स्थापित कर, हिन्दी राष्ट्रभाषा का सम्मान प्राप्त कर सकती है

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


हम किसी पर कुछ भी थोप नहीं सकते। इसी सन्दर्भ में हमें अपनी हिन्दी-भाषा को भी समझना होगा। इतिहास साक्षी है कि विश्व की भीषण समस्याएँ भी मिल-बैठकर सुलझा ली गयी हैं।

सर्वप्रथम हमें यह समझना होगा कि हिन्दी-भाषा को ‘राष्ट्रभाषा’ बनाने के मार्ग में कौन-कौन-सी बाधाएँ हैं, तत्पश्चात् हमें उन बाधाओं की प्रवृत्तियों का विशद और बृहद् अध्ययन करना होगा। उसके बाद हमें विचार करना होगा कि उन बाधाओं और हिन्दी की समग्र गतिशीलता के मध्य समन्वय और सामंजस्य स्थापित करनेवाले कौन-कौन-से कारक हैं। उन कारकों के सम्मुख हिन्दीभाषा-ध्वज को सुदृढ़ता से थामकर रखनेवाले हम हिन्दी-अनुरागीजन को अतीव विनम्रतापूर्वक स्वयं को प्रस्तुत करना होगा। इसी क्रम में हम हिन्दीभाषा-भाषीगण को उक्त अहिन्दीभाषा-भाषी विद्वज्जन के साथ निरन्तर संवाद-स्तर पर उनकी भाषा और हिन्दी-भाषा के अन्तर्सम्बन्धों पर सैद्धान्तिक और व्यावहारिक विचार-मन्थन करने की आवश्यकता है। उनकी साहित्य-भाषा आदिक को आधार बनाकर हम अपने यहाँ सारस्वत आयोजन करें और विशेषत: उस समूह को सादर निमन्त्रित करें, जो हमारी भाषा को राष्ट्रपटल पर लाने के प्रति मतभेद व्यक्त करते हैं। इससे सौजन्य का एक ऐसा वातावरण उत्पन्न हो जायेगा, जो अहिन्दी भाषा-भाषियों को हिन्दी के प्रति उदारता बरतने के लिए विवश कर देगा। वहाँ के परम्परागत ग्रन्थों का हम हिन्दी-भाषा में अनुवाद और रूपान्तर की प्रक्रिया से जोड़ देंगे तो अन्तत:, हम अपनी हिन्दीभाषा को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित कराने में समर्थ हो सकेंगे। इनके अतिरिक्त ‘और भी’ सकारात्मक और व्यावहारिक मार्ग हैं, जिन पर चलते हुए, हम बिना किसी राजनीतिक उपक्रम के हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिबिम्बित करने में सफल हो सकते हैं। पहले संवाद का क्रम आरम्भ तो हो।

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; १४ सितम्बर, २०१८ ईसवी)