
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
यह एक ऐसा गड्ढा है, जिससे होते हुए, देखते हुए, देखकर बुदबुदाते हुए तथा ‘धृतराष्ट्र’ बनते हुए, न जाने कितने चिकित्सक, शासकीय अधिकारी, नगर निगम के अधिकारी-कर्मचारी तथा उस वार्ड का सभासद, मीडियाकर्मी, तरह-तरह के बुद्धिजीवी तथा समाज की चिन्ताओं को एक गठरी में बाँधकर गले में लटकाकर ‘वाहवाही’ बटोरनेवाली ‘समाजसेवक-सेविकाएँ’ आयी-गयी होंगी; परन्तु अभी तक किसी की उस गड्ढे पर नज़रें पूरी तरह से नहीं फिसलीं।
ज्ञातव्य है कि यह गड्ढा इलाहाबाद के प्रमुख चिकित्सालय ‘स्वरूपरानी नेहरू चिकित्सालय’ (जिसे पढ़े-लिखे-कढ़े लोग ‘मेडिकल कॉलेज’ (ग़लत नाम) के नाम से जानते-समझते आ रहे हैं।) के प्रमुख प्रवेश-द्वार पर ही क़ातिलाना और शातिराना अन्दाज़ में न जाने कब से अपने शिकार की टोह में पड़ा हुआ है। वही एक ऐसा मार्ग है, जिधर से मरीज़ और उनके तीमारदार पैदल और वाहनों से आते-जाते हैं। थोड़ी-सी भी लापरवाही उनके हाथ-पैर तो तोड़ेगी ही; चेहरे की रंगत भी उतार देगी।
आश्चर्य है! आज तक चिकित्सालय-प्रशासन/प्रबन्धन ने उस भयानक गड्ढे की शिकायत सम्बन्धित विभाग में नहीं की है।
भला हो मेरा कि मेरी ‘कृपा-दृष्टि’ १३ अगस्त, २०१८ ईसवी को उस उपेक्षित, किन्तु निर्दय गड्ढे पर पड़ गयी और मेरा दृष्टिबोध ऐसा जाग्रत हुआ कि अंग-भंग करने में दक्ष उस गड्ढे को मैं सार्वजनिक करने की स्थिति में आ गया।
हमारा समाज, विशेषत: स्वयं को ‘बुद्धिजीवी’ माननेवालों की बुद्धि कुन्द पड़ चुकी है, अन्यथा उक्त गड्ढा के अब तक ‘काया-कल्प’ हो चुका रहता।
बहरहाल, नगर निगम अथवा जिस भी कार्यालय के दायित्व-क्षेत्र में यह विषय आता हो, शीघ्रातिशीघ्र इस ख़तरनाक गड्ढे को अच्छी तरह से भरवाकर जनसामान्य के लिए निष्कण्टक मार्ग बनवायें। यदि वहाँ पर सीवर का ढक्कन रहा हो तो उसे वहाँ लगवाकर अपनी कर्त्तव्यपरायणता का परिचय देते हुए, जनसामान्य के आशीर्वाद के भागी बनें, अन्यथा ‘नरक’ का द्वार तो प्रतीक्षा कर ही रहा है।