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न्यूइण्डिया के मक्कारो! देश को उत्तर दो

आचार्य पं॰ पृथ्वीनाथ पाण्डेय

‘मुक्त मीडिया’ का ‘आज’ का सम्पादकीय

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

वर्ष १९६२ की बात नहीं, वर्ष २०२० की बात करो।
२५ अप्रैल को सूचना दी गयी थी कि चीन भारत की सीमा में घुस चुका है तब कहा जाता रहा कि चिन्ता की कोई बात नहीं, बात करके हल निकाला जा रहा है और जब १५-१६ जून को चीन के सैनिकों ने पूर्व-नियोजित तरीक़े से हमारे सैनिकों पर हमला कर २० से अधिक सैनिकों की निर्मम हत्या कर दी थी तब अब तुम्हारे दलाल प्रवक्ता कह रहे हैं– यह नेहरू की देन है। हमारे सैनिकों की हत्या की सूचना १६ घण्टे-बाद देश को क्यों दी गयी थी? हमारे कई सैनिक अब भी गम्भीर रूप से घायल हैं; परन्तु उनकी संख्या और अन्य वास्तविकता छुपा ली गयी है, क्यों?

अब कहते हो, चीनी सामान का बहिष्कार देश करेगा। जब तक चीन के सामानों का आयात न्यू इण्डिया के ठीकेदार लोग करते रहेंगे, उनका बहिष्कार सम्भव ही नहीं, इसलिए आयात-निर्यातनीति में संशोधन कर अब चीनी सामानों का आयात नहीं करने का निर्णय करना होगा और उसी क्षण क्रियान्वयन् भी। वहीं स्वदेशी प्रयोग और आत्मनिर्भर रहने की बात करनेवाले भूल रहे हैं कि उन्होंने हमारे मूल देश भारत को दो भागों में बाँट रखा है :– भारत हमारा और न्यूइण्डिया उनका। ऐसे में, भारत को जान-बूझकर जर्जर किया जा रहा है, ताकि न्यूइण्डिया का वर्चस्व बना रहे। यही कारण है कि आज न्यूइण्डिया के हरकारों ने भारतीय समाज को ‘दिव्यांग’ बनाने की दिशा में काम करना आरम्भ कर दिया है।

सच तो यह है कि न्यूइण्डिया की मोदी-सरकार को रुपये बनाने की चिन्ता है, हमारे ‘भारत’ की नहीं। इस मोदी-सरकार को अन्तरराष्ट्रीय मंचों से चीन लगातार घुड़की देता रहा है; न्यूइण्डिया को वैश्विक महत्त्व देने के प्रस्तावों पर अपना विशेषाधिकार (वीटो) का प्रयोग करता रहा; हमारे सीमाक्षेत्र को अपना बताते हुए सड़कें, हेलीपैड आदिक का निर्माण करवाता रहा और नीरो चैन की वंशी बजाता रहा। जब भी चीनी सैनिकों के भारतीय सीमा में घुसपैठ करने की बात पर न्यूइण्डिया की मोदी-सरकार अथवा उसके दलाल प्रवक्ताओं से प्रश्न किया जात रहा तब उनका एक ही जवाब होता था और आज भी वही जवाब है– भारत-चीनसीमा- विवाद ‘पं० नेहरू’ की देन है। ऐसे में, सहज ही प्रश्न है, पिछले छ: वर्षों से न्यूइण्डिया की सीमा में घुसकर जब चीनी सैनिक लगातार उकसावेवाले कुछ-न-कुछ कृत्य करते आ रहे हैं तब से न्यूइण्डिया के बादशाह नरेन्द्र मोदी के सिपहसालार क्या कर रहे थे? पिछले छ: वर्षों से चीन की जी०डी०पी० न्यूइण्डिया से अधिक क्यों है, इस पर नरेन्द्र मोदी और उनकी अनुभवहीन अर्थमन्त्री ने कभी जानने की कोशिश की है? जो व्यक्ति स्वयं और अपनी पार्टी ‘भारतीय जनता पार्टी’ के लिए ही जी रहा हो, उससे भारतहित की अपेक्षा करना व्यर्थ है।
पिछले छ: वर्षों से न्यूइण्डिया की मोदी-सरकार बालाकोट, पुलवामा-प्रकरण से लेकर न जाने कितने विषयों पर यह सरकार सच्चाई को सामने लाने में हिचकती रही। एक निरंकुश व्यक्तित्व के रूप में नरेन्द्र मोदी देशवासियों के साथ व्यवहार करते आ रहे हैं, जो किसी ‘चौकीदार’ के चरित्र से नितान्त भिन्न है।

न्यूइण्डिया का दु:स्वप्न दिखानेवाले अब ‘भारत’ की बात करें। सबसे पहले सर्वदलीय बैठक बुलाकर वस्तुस्थिति से अवगत कराते हुए एकजुटता का प्रदर्शन करने की आवश्यकता है। दिल्ली-स्थित चीनी दूतावास को अस्थायी तौर पर बन्द कराया जाये। देशवासियों को समस्त तथ्यों और वर्तमान हालात से अवगत कराया जाये। देशवासी न्यूइण्डिया नहीं, ‘भारत’ के साथ है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १७ जून, २०२० ईसवी)

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