ज़िंदगी अब इक तंज़ बन के रह गई
बिन तेरे दुनिया रंज बन के रह गई ।
नाख़ुदा कौनसी स्याही से मानेगा
अश्कों का रंग भी अब सुर्ख़ हो गया ।
बिखर गया हूँ कुछ इस तरह से कि
इक टुकड़ा फलक पे दुसरा ज़मीं-दोज़ हो गया ।
रह रह के देखता हूँ मुड़ के पीछे
बवंडर लूट के मुझे ख़ामोश हो गया ।
डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’