डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय–
जी हुज़ूर! मैं सम्पादक हूँ;
तरह-तरह का सम्पादक हूँ;
किसिम-किसिम का सम्पादक हूँ।
पूर्वग्रह से ग्रस्त सम्पादक हूँ।
सवाल है–
रूप-रुपये-रुतबे का
तलाश है, ऐसे दाताओं की
फिर तो आपको फ़ीचर-पेज का
स्तम्भकार बना दिया।
आप इसे
‘कदाचार’ की संज्ञा नहीं दे सकते।
मैं तो आप पर एहसान कर रहा हूँ ;
‘वाइड पब्लिसिटी’ कर रहा हूँ।
भविष्य की कोई चिन्ता नहीं ;
सभी नावें किनारे लग चुकी हैं।
एक ही तो बेटा है ‘फकीरचन्द’
कीर्तिमान बनाने में उसका
कोई सानी नहीं।
पंचवर्षीय योजना का ‘फैन’ है
पिछले पाँच वर्षों से
कक्षा दस का विद्यार्थी रहा है
मगर अब– वह है ‘अमीरचन्द’
क्योंकि मेरे अख़बार का ‘न्यूज़ एडिटर’ है।
कल ही तो बेटी की सगाई थी।
हॉस्टल में रहती थी;
नाम है ‘मटकन कुमारी’
दस-दस बॉय-फ़्रेण्डों में रमती थी।
मुँह से फूँकती थी
और नाक से निकालती थी।
अजब नाम बताती थी।
कहती थी– ‘धूम्रदण्डिका’ है।
लड़का भोला-भाला है।
नाम है ‘ईमानचन्द’
‘बलात्कार’ के मामले में
जेल की रोटी तोड़ रहा था।
मुख्यमन्त्री जी की मेहरबानी से
उसकी ज़मानत हो चुकी है।
अब वह
मेरे अख़बार का ‘कॉपी-राइटर’ है।
भतीजा कक्षा पाँच फेल था।
नाम है ‘ज्ञानचन्द’;
गाँव में ‘भैंस’ चराता था
मगर अब—
मेरे अख़बार का ‘फ़ीचर-एडिडर’ है ।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ३० नवम्बर, २०१९ ईसवी)