जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबादजब जीवन ज्योतिर्मय हो जाए,
मम हृदय समर्पित हो जाए।
इस कोलाहल से मिले शान्ति नाथ!
निज मार्ग प्रवर्तित हो जाए।।१।।
सत्य सदा मम उद्गार बने,
जीवन में न असत्य की रार ठने।
उद्वेलित न हो मम शब्द कभी,
कर्तव्य राष्ट्र प्रगति का हार बने।
हठ कभी न ऐसा मन में आए,
जिससे मस्तक समाज में झुक जाए।
ऐसा अज्ञान मुझमें न उगे नाथ!
जिससे मम जीवन गर्हित हो जाए।।२।।
जब जीवन०……………….
संतुष्टि मम स्वर्णिम श्रृंगार बने,
उच्छृंखलता न घेरे चहुँओर घने।
मम दृष्टि न कुदृष्टि की वाहक हो,
मम मस्तक राष्ट्र सिरमौर बने।
अगणित नक्षत्र समूहों सी ,
निश्छल विचार उत्सर्जित हो जाएं।
मन में जो तम भरा नाथ!
त्वं शरण विसर्जित हो जाए।।३।।
जब जीवन०……………………. ..
जिज्ञासा मेरी नित बनी रहे,
त्वं कान्ति की चादर तनी रहे।
मन पुण्य प्रताप प्रवाहित हो,
निर्मलता जिससे घनी रहे ।
इतना साहस हो मन मन्दिर में,
बन्धु- बान्धव भी ऊर्जित हो जाए।
ऐसी संगति मिले नाथ!
मम जीवन संदर्भित हो जाए।।४।।
जब जीवन०……………………. ..