पृथ्वीनाथ पाण्डेय–
कुछ ही समय पहले इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने लखनऊ के ज़िलाधिकारी और मण्डलायुक्त को ५७ आरोपितों के लगाये गये पोस्टरों को शीघ्र हटाने का आदेश किया है। पोस्टरों पर आरोपितों के नाम और पतेे अंकित हैं। न्यायालय ने यह भी आदेश किया है कि १६ मार्च तक अपने शपथपत्र प्रस्तुत करते हुए बतायें– पोस्टर हटाये गये हैं अथवा नहीं?
उल्लेखनीय है कि यह उत्तरप्रदेश-शासन-प्रशासन का अवैध कृत्य है। इस तरह से यदि उक्त के मनबढ़ मनोवृत्ति पर अंकुश नहीं लगाया जाता तो आनेवाले कल में वे किसी की भी इज़्ज़त नीलाम करने का रास्ता इख़्तियार कर लेंगे।
वसूली के नाम पर यदि किसी की ‘निजता का हनन्’ करना ही है तो न्यायालय में जायें। जैसा कि बताया जाता है कि उक्त ५७ आरोपितों के चलचित्र सार्वजनिक सम्पत्ति की क्षति करते हुए शासन-प्रशासन के पास सुरक्षित है तो उसके लिए उसे न्यायालय में प्रस्तुत करें, ताकि जो अपराधी दिखें और जिन पर आरोप सिद्ध हो, उन्हें कठोरतम दण्ड दिया जा सके; क्योंकि कोई भी वैसा कृत्य करता है तो उसे क्षमादान नहीं किया जा सकता।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ९ मार्च, २०२० ईसवी)