महेन्द्र नाथ महर्षि (से. नि. अ. दूरदर्शन दिल्ली)-
नृत्य क्या है ? क्यों किया जाता है ? इसका जबाब अगर परिभाषा और परंपरा में लपेट कर देने की कोशिश की जाए तो मुश्किल है। सरल परिभाषा में कहें तो इसकी व्याख्या होगी उल्लास और मौज में प्रस्तुत उस आनन्द की अनुभूति जो नर्तक को विभिन्न हाव-भावों से विभूषित कर भरपूर सुख दे और दर्शक को सहज ही संगीत के साथ विस्मय और उत्साह भरा मनोरंजन प्रदान करे । नृत्य, शास्त्रों में उल्लिखित सहज मनोरंजन की एक विधा है भी और नहीं भी । है इसलिए कि उसके कुछ भाव हैं जो उसे मर्यादा प्रदान करते हैं , नहीं इसलिए कि इसे बन्धनों में बाँध कर आनन्द की अभिव्यक्ति से विमुख नहीं किया जा सकता । रानी पद्मावती के काल के घूमर का कोई चित्र या जीता जागता प्रमाण आज मौजूद नहीं है। कुछ क़लमकारी की मिनिएचर हो सकतीं हैं । पर क्या हम कह सकते हैं कि क़लमकार नें उसमें अपनी कल्पना से कुछ जोड़ा-घटाया न होगा ? सामंती युग में जब घूमर चारदीवारी में ही पल्लवित था तो वह पुरुषों ने कहाँ से देखा होगा ? यह कुछ सहज प्रश्न हैं जो उत्तर माँगते हैं । नृत्य के लिए संगीत की संगत ज़रूरी है , उसे किसने और कैसे लय-ताल मे निबद्ध किया होगा ? लगता तो यह है और साक्ष्य रूप में भी यह ठीक ही लगता है कि घूमर एक लोक नृत्य है जो शास्त्रीय नृत्य के स्थापित सिद्धांतों से मुक्त , लोक उद्गारों की विभिन्न अवसरों पर ख़ुशी के लिए किया गया एक आयोजन । लेकिन तब भी इसमें फ़सल से जुड़ा वह उल्लास नहीं जैसा कि पंजाब के भांगड़ा नृत्य में दिखता है। हां इसका साम्य गिद्दे से जोड़ा जा सकता जो महिलाएँ सामान्यतः पारिवारिक ख़ुशियों के मौक़ों पर पंजाब में करतीं हैं।
अब आएँ घूँघट पर। इसे चेहरे की लज्जा का गहना माना जाता है। यह आज तक भी ठसके से जारी है , कहीं परम्परा के नाम पर तो कहीं लोकोपचार के लिए। नव विवाहिता की मुँह दिखाई की रस्म अब भी परंम्परा रूप में अपना वजूद क़ायम रखे हुए है । फ़िल्मों-नाटकों में सुहाग रात के नज़ारों को नज़ाकत और ख़ूबसूरती देने के लिए ही शामिल किया जाता है। लेकिन घूँघट की ज़रूरत रनिवास में तो रही नहीं होगी। राजशाही के दौर में मनोंरंजन करने के लिए दरबार का घूमर क्या हाथों की कुछ हिलन -डुलन तक सीमित रहा होगा , क्या झीनी चूनर सिर पर ओड कर चक्कर लगाती नृत्यांगनाओं के लहंगे गोल गोल घूमते छतरी नहीं होते होंगे , जो इसको ‘घूमर’ नाम से परिभाषित करते हैं ? जब पैरों की तेज़ गति से चक्कर-फेरे लिए जाते होंगे तो क्या पैरों पर मौजे चढ़े होते होंगे ? कोई संतोषजनक उत्तर शायद ही मिल पाए। संगीत-नृत्य , चित्रकला , मूर्ति कला आदि कल्पना से उपजी विविध विधाएँ हैं जिन्हें कठोरता से कुछ एक सिद्धान्तों में बाँध कर नहीं रखा जा सकता। यदि ऐसा होता तो मानव भव्य महलों का निर्माण न कर पाता और आज भी वनमानुष की तरह कंदराओं में बसा होता क्योंकि मधुमक्खी ने अपने छत्ते का डिज़ाइन नहीं बदला, बया चिड़िया ने अपने सुन्दर घोंसले में कोई परिवर्तन नहीं किया। ऐसा क्यों ? क्यों कि इनकी कल्पना का दायरा सुरक्षा की ज़रूरत तक सीमित है। लेकिन मानव अपनी सुरक्षा के साथ ज़रूरतों में सुख जोड़ना जानता है जो देह को आराम और मन को सुखद संतोष देने का निरंतर प्रयास है। सृजन -शीलता मानव की विशेषता है जिसने उसे एक जैसी वस्तुओं अथवा परिस्थियों से उब जाने और फिर उनसे उबर जाने या कुछ नवीन पाने की चेतना दी है। यही अंतर है जो मानव को पशु-परिन्दों से श्रेष्ठ बनाता है और आजतक की उसकी उपलब्धियों का कारक भी बना हुआ है।
संजय लीला भंसाली की नई फ़िल्म “पद्ममावती” पर आ रही तीखी प्रतिक्रियाएँ इसे यथार्थ से जोड़कर देखने की सीमित सोच लगती है क्योंकि घूमर और घूँघट एक काल विशेष की मुहरबंद चिट्ठी नहीं है और न ही विक्रमादित्य से बेताल का वह प्रश्न जिसका उत्तर सुनते ही वह पेड़ पर वापस लौट जाया करता था। युग बीत गया है, मनोंरंजन की विधाओं को पंख लग चुके हैं और वो मोबाईल से मुट्ठी में आ गए हैं। तो कल्पनाओं के पर काटे नहीं जा सकते बल्कि फैलाने होंगे। फ़िल्में कथा हैं , कहानी हैं-फ़िक्शन हैं। फ़िल्मों में इतिहास मात्र संदेश है संदर्भ नहीं। हो भी नहीं सकता। उसे तो नाट्य-रूपांतर की तरह ही देखा जा सकता है क्योंकि बीते काल के वास्तविक पुरुष- नारी , घोड़े-हाथी ,महल-मैदान तो युग के साथ ही विलुप्त हो गए। तरक़्क़ी आगे आगे दौड़ती कल्पना मे है जिससे कला को निखार मिलता है। दीपिका का घूमर इस युग का ‘आज ‘है जिसमें वैभव भी है और कला की एक झलक-खनक। अगर यह बर्दाश्त नहीं तो फिर क्या मध्य युग के चरण पखारने के लिए वापस लौटा जाए ? क्या जौहर या सती-प्रथा की कल्पना आज भी की जानी चाहिए ? फ़िल्म “पद्मावति” के जौहर दृश्यों की आलोचना , भर्त्सना भी की जानी चाहिए क्योंकि यह अब मान्य नहीं है। कल्पना और कला की नव रश्मियाँ उदित होती रहनी चाहिए। जो बीत गया वह परंपरा है, इसलिए सम्मान की बात है। वह नींव है , पर क्या नींव को अपने आधार पर उठते भवन की उम्मीद नहीं करनी चाहिये ? भवन से ही तो नींव का सौन्दर्य है , जैसे माँस मज़्जा से हड्डी-पिंजर का आकर्षण। कला-कल्पना का भी यही रिश्ता है। भाई फ़िल्म तो तीन घंटे का छोटा सा संसार है जो स्थापित संस्कारों और इतिहास को एक झटके में बदल नहीं सकता । समाज को बड़ा दिल रखना होगा अपितु बया का घोंसला सुन्दर होते हुए भी कभी एक खिड़की नहीं बना सका।