स्मरण : बाबा जी का चश्मा

आकांक्षा मिश्रा, गोंडा, उत्तर प्रदेश-


मकर संक्रांति की तैयारी दादी पूरी शिद्दत से करती थी इस पर्व के पूर्व ही तिवारी जी को नेवता देती उनके लिए धोती, कुर्ता, गमछा, इक्कीस रूपये धोती के छोर में बाँध लेती । अक्सर मैं दादी के पास रहती थी काफी कुछ सीखने को मिला । 2004में खिचड़ी की पूरी तैयारी हुई, काफी उत्साहित थी दादी लेकिन उसी रात बाबा की तबियत ज्यादा ही खराब हुई बचना मुश्किल रहा । दादी भी ठगी सी आंसू नहीं निकले उस समय । उसके बाद कभी खिचड़ी, मकर संक्रांति नहीं मनाई गई और न दादी ने कभी खिचड़ी खाना पसन्द किया ।

विश्वास टूटने के बाद एक आस्था अब तक बनी रही । उनके पास सदैव बाबा का एक कोट था जिसे वह बहुत ही सम्भाल कर रखती थीं । 2012 में जब दादी की तबियत खराब हुई तो वह अपने साढ़ू डॉ. रामउजागिर पाण्डेय को दिखाने गई ( अंतिम स्टेज पर चलकर डॉक्टरों में सबसे ज्यादा भरोसा पापा के मौसिया, सभी मौसिया ही कहते है यानि पाण्डेय जी पर भरोसा था) । काफी दिन बाद आई दादी का जबाब भी निराला रहा ठीक ही रहती हूँ, इसलिए इस बार दवा ले ली तो पांच साल चंगी रहूँगी । जाँच के बाद स्थिति खराब होने के बाद भी डॉक्टर ने हंसते हुए कुछ दवाइयाँ देकर विदा किया लेकिन पापा और चाचा को उन्होंने पूरी स्थिति से अवगत करा दिया था, ये समय दिसम्बर 2011 का रहा था । उसके बाद 6 फ़रवरी को दादी हम सभी को छोड़ कर चली गईं । बाद में सभी यथावत् अपने -अपने कार्यो में लग गए । कुछ समय बाद दादी जहाँ हर समान रखती थीं वहाँ से एक कोट और कोट की जेब में चश्मा मिला, जिसे दादी कभी – कभी हाथ में लिए देखती रहती थीं । लेकिन जब ध्यान से देखा गया तो ये सब बाबा का था ।