आकांक्षा मिश्रा
तुमने नहीं कहा तो क्या हुआ तुमको कहने के लिए ही मैंने कब कहा ? मैं खुद कहते-कहते मौन हो जाती हूं । कहने को कितनी बातें शेष है, शेष बातें इस तरह…..
दूर एक आवाज करती हुई मोटरकार चली जा रही ।एक शब्द को लिए भीतर एक सुंदर हृदय उसे क्या पता ? एक इंसान उसे पाने का ख्वाब बुन रहा है उसके साथ दूसरी जहां में जाने का ख्वाब क्या पता ?बेहद खोया हुआ भीतर और भीतर हृदय में कितनी हलचल है कितने कहकहे हैं उसमें स्वयं जाने चलो यह अच्छा है कुछ ना कह पाने की एक भूली यादें अनसुलझी सी हमारे भीतर भी है कह देने से कहीं बिखर ना जाए यह प्रेम इसलिए अधूरा सा है कहने, प्रकट कर देने मात्र से आप ही आपका ही प्रेम एक विविधा से दुविधा बन जाए आत्मा में अस्थाई निवास से मुक्ति की आकांक्षा का भी मांग है इसका आशय कह दिया जाना चाहिए कहने के लिए प्रेम की पराकाष्ठा या अविभूति दोनों में कितना अपनत्व है अपने होने से कही ज्यादा आप रचे हुए अपनेपन से भिन्न है । सब कुछ प्रेम है इसी ढाई अक्षर से घर का निर्माण होता है घर बेहद अपने स्वभाव से समर्पण भाव से ‘क्रिया’ प्रधान होकर ‘कहने से शेष’ जिसका स्वभाव ही है सब कुछ साथ ले चलना और व्यवस्थित करना और भी व्यवस्थित करना जिसे तुम भी आकार दे सकते हो और व्यवस्थित करने में सहयोग कर सकते हो यह हमारा नहीं तुम्हारा भी प्रेम होगा प्रेम होगा कहने से शेष ।