प्रभात सिंह-
1923 से “कलावती गट्टा” कन्नौज के मशहूर गट्टे का पर्याय बना हुआ है। यूँ तो कन्नौज अपनी खुशबू के लिए प्रसिद्ध है। कन्नौज की धरती पर प्रौढ़ होकर इत्र/इतर/अतर /खुशबू/सेंट/फ्रैगरेंस देश दुनिया के कई हिस्सों को महकाते हैं। पर खुशबू से इतर यहाँ की मिठास “कलावती के गट्टे” के रूप में ज़ुबान को पानी पानी करती है। स्थानीय लोग, देश दुनिया से आने वाले इत्र के कारोबारी कन्नौज से कलावती के गट्टे अवश्य घर के लिए ले जाते हैं। अमूमन झक्क सफ़ेद गट्टे की तासीर ठंढी और तबियत सख्त होती है। पर “कलावती का गट्टा” अपनी तबियत के उलट बेहद मुलायम और मुँह में रखते ही घुल जाने के लिए मशहूर है। जो मुलायम न हो, मुहँ में रखते ही घुले न वो कलावती का गट्टा नही। गट्टे की पैकिंग पर **नक्कालों से सावधान** की हिदायत नाम खराब होने का डर भर है। कलावती की चौथी पीढ़ी आज भी गट्टे के बनने की विधि पर एकाधिकार रखती है।
क्या खास है इस गट्टे में !
गट्टा बनाने की प्रमुख सामग्री सफ़ेद चीनी ही है। चीनी की चाशनी को दूध में घोल कर गट्टे की शक्ल दी जाती है। उसके पहले उसमें कई तरह के मसाले डाले जाते हैं। जावित्री, लौंग, इलाइची, गुलाब की पत्ती, गरी आदि। ऊपर से गट्टे को सजाने के लिए चिरौंजी, किशमिश, बादाम,पिस्ता, काजू आदि। देशी घी, महक के लिए केवड़ा।
इतिहास के झरोखे से
81 वर्ष के टापू राम कन्नौज के गट्टे और कलावती के गट्टे के इतिहास के बारे में बताते हैं, तो समय की क्रमशः दो स्याह सफ़ेद परतें उघाड़ के रख देते हैं।
छुआछूत
वो तर्क देते हैं, कि पहले के जमाने में छुआछूत अत्यधिक था, ब्राम्हणों और ऊँची जाति के लोग अक्सर नीची जाति के हाँथों से उगाई हुई फसल या अन्य सामग्री से बनी मिठाई नहीं खाते थे, इसलिए गट्टे का प्रचलन हुआ, जिसमें केवल चीनी का ही उपयोग होता था। ये उनका मानना था, और कम लागत की वजह से गट्टे सस्ते भी हुआ करते थे। बतास्फेनी, बताशे, गटिया आदि भी पूजा पाठ या अन्य माँगलिक कार्यक्रमों में उपयोग किये जाते थे।
घूँघट और कलावती
टापू राम जी “कलावती के गट्टे” के मशहूर होने के कारणों में से एक यह भी बताते हैं कि पहले कन्नौज में पर्दा प्रथा खूब थी। चूँकि उनकी माँ कलावती विवाह के बाद अपने पति के साथ कन्नौज में ही रहीं। कलावती के पति कभी पहलवान हुआ करते थे, उम्र के साथ उनके घुटने कमज़ोर होते गए, उन्हें उठना बैठना मुश्किल होता था। लिहाज़ा गट्टे बनाने का काम उन्होंने ही संभाल लिया। वो अपने मायके में ही थीं इसलिए उन्हें पर्दा नही करना पड़ता। फिर भी एक महिला होते हुए उनका दुकान पर बैठना चर्चा का विषय रहता। दुकान पर आने वाले जानने वाले कलावती बिटिया, कलावती बहन, कलावती जिज्जी के नाम से पुकारते। धीरे धीरे ये खास गट्टे कलावती के नाम से मशहूर होने लगे। अपने जीते जी कलावती ने गट्टे की पैकिंग का डिज़ाइन भी बनवाया था, जिसकी छाप आज भी गट्टे के डिब्बे पर दिखती है। ये वाकई तारीफ की बात है, जब एक समय एक शहर सिर्फ अपनी खुशबू के बारे में जाना जाता हो, तब गट्टे ऐसी मामूली मिठाई की ब्रांडिंग, उसकी शुद्धता, उसकी गुणवत्ता बनाये रखना अपने आप में मिसाल है। सबसे चौकाने वाली बात है, कि वो पढ़ी लिखी नही थी, फिर भी उन्होंने न केवल दुकान, घर संभाला, और अपने आप को अमर कर लिया।