जन्मभूमि की बदहाली पर दो शब्द

डॉ. दिवाकर दत्त त्रिपाठी “गंजरहा”


ऐ जन्मभूमि बहराइच !
नीति आयोग की रिपोर्ट आई है ,तुम्हें भारत के अग्रगण्य पिछड़े जिलों मे रखा गया है । भगवान बुद्ध की तपोस्थली, मुसलमानों का बड़ा तीर्थ प्रदेश की राजधानी से सिर्फ १२० किमी. की दूरी पर,और भारत का सीमांत जनपद होने के बावजूद निरंतर तुम्हारी अनदेखी की गई ।
तुम वही सरजमीं हो जहाँ 1857 के गदर की रूपरेखा तैयार की गई । 1857 के क्रांतिनायक राजा कुँवर बलभद्र सिंह ने जिस जमीन पर जन्म लिया ।बेगम हजरत महल लखनऊ से भागने के बाद जहाँ छुपी ।
तुम सनातन संस्कृति के रक्षक महराजा सुहेलदेव की राजधानी भी रही, मगर आज तुम्हारी पहचान मात्र एक पिछड़े जिले के रूप में रह गई है ।
यह बात अलग है कि प्राकृतिक संसाधनों के मामलों में तुम बहुत संपन्न हो ,नदियों के उपजाऊ तराई के मैदान ,वन्य संपत्ति और जैव विविधता के मामले में अत्यंत धनी हो ।
मगर मानव संसाधनों के नाम पर जो कुछ है वह अत्यंत न्यून है, राजधानी से जोड़ने के लिए मात्र एक बौद्ध परिपथ का टू लेन राष्ट्रीय राज्यमार्ग ।
शिक्षा के नाम पर मात्र एक ठीकठाक महाविद्यालय ,न कोई इंजीनियरिंग कालेज ,न कोई मेडिकल कालेज ।
हाय आजादी के 60 साल बीत गये ,तुम्हें एक सही सलामत रेलवे ट्रैक तक नही मिला ।
जिम्मेदार कौन है ?
बहराइच के राजनेता।
सरकार कोई भी बहराइच से एक दो मंत्री बनाये ही जाते हैं ,जो सिर्फ अपना और अपनों का घर भरते हैं ।
एक नही दो दो संसदीय क्षेत्र होने के बावजूद किसी सांसद ने बहराइच की समस्याओं और विकास पर आज तक ध्यान नही दिया ।

अगर जनपद का विकास करना है तो मात्र एक ही उपाय है :- इन सारे चोर नेताओं को भगाओ ,नोटा का बटन दबाओ ।