राजनीतिक षडयन्त्रों में छटपटाते राष्ट्रनायक

जगन्नाथ शुक्ल, (इलाहाबाद)


भारतवर्ष प्रत्येक कालखण्ड में स्वार्थी तत्त्वों से ही घिरा रहा है, वर्त्तमान भी इससे अछूता नहीं है। दरअस्ल वर्त्तमान सत्तासीन दल ने भी अपने दलीय संविधान के चीरहरण में कोई कोताही नहीं बरती है और आज ८० प्रतिशत भारत में शासन कर रही है। वास्तविकता यह है कि भारतवर्ष में शासन करने वाले को जितनी आनन्दानुभूति होती है तथा परिस्थितिजन्य प्राप्त विषाद में ही आनन्द की अनुभूति करता है शासित वर्ग। यदि वर्त्तमान परिप्रेक्ष्य की बात करें तो सत्तासीन दल जो चाह रहा है वही हो रहा है, इसका प्रमुख कारण है चिन्तन विमुख विपक्ष; विपक्ष सत्ता सुख का इतना आदी हो चुका है कि उस उन्माद में उसने अपनी चिन्तनशीलता को खो दिया है।

जहाँ लाभ की स्थिति है वहाँ तो केवल हाँ में हाँ मिलानी होती है तो वह कोई बड़ी बात नहीं है। सत्तासीन दल जितना धर्म की अफ़ीम बाँटता है, विपक्ष उससे कम अर्थहीन सेकुलरिज़्म के बहाने उन्माद की स्थिति नहीं उत्पन्न करता। आज ताज़ा प्रकरण है बोधिसत्त्व बाबा साहब डॉ० भीम राव रामजी अम्बेडकर के नाम को लेकर; तो कोई उन्हें बाबा साहब कहता है तो कोई भीमराव अम्बेडर कहता है, वहीं अधिकांश दक्षिण भारत के प्रान्तों के अतिरिक्त गुजरात एवं महाराष्ट्र में पिता के नाम को जोड़ने की एक लम्बी परम्परा रही है।

यह सत्य है कि सत्तासीन दल ने जिस मानसिक खोट के साथ इस बदलाव को सहमति दी है किन्तु यह भी विकट सत्य है कि विपक्ष ने इस बात को उतना ही प्रचारित किया जितना कि सत्तासीन दल चाहता था। उद्देश्य दोनों का एक ही है मत प्राप्त करना, बाक़ी न तो राष्ट्र से सरोकार है, न ही राष्ट्रीयता से।

एक भारतीय होने के नाते मैं सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों से यह निवेदन करता हूँ कि अपनी गन्दी अमानुषी प्रवृत्तियों एवं कुटिल राजनीतिक महत्वाकांक्षा से इन राष्ट्रनायकों को दूर रखिए, आपकी महान कृपा होगी।