डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
वर्ष २०१४ से अब तक भारत की आन्तरिक दशा अत्यन्त शोचनीय हो चुकी है। भारत में जब से राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन की ओर से नयी सरकार गठित हुई है तब से उसी सरकार के ठीकेदारों-द्वारा लगातार भारत की राष्ट्रीयता पर घात-प्रतिघात किये जा रहे हैं; हम-ही-हम सत्ता के केन्द्र में बने रहें, भले ही ‘राष्ट्रधर्म’ को नीलाम करना पड़े, यह है, उक्त गठबन्धन, विशेषत: उसके मुख्य घटक भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय नेताओं का ‘अतिरिक्त राष्ट्रीय चिन्तन’ और आत्म मन्थन शिविरों का निष्कर्ष और उनके आचरण की सभ्यता!
इस गठबन्धन के सत्ता में आते ही भारतीय राजनीतिक मंच पर धर्म और जाति का नग्न नृत्य आरम्भ हो चुका था, जो अब अपने चरम की ओर तेज़ी में बढ़ रहा है।
भा०ज०पा०की ओर से आयेदिन ऐसी-ऐसी नीतियों का क्रियान्वयन् किया जा रहा है कि उस सरकार को ‘भारत-सरकार’ कहते हुए भी ‘लज्जा’ का अनुभव हो रहा है, अत: उस सरकार को ‘भारतीय जनता पार्टी की सरकार’ अर्थात् ‘मोदी-सरकार’ कहना ही व्यावहारिक रूप में सर्वथा उपयुक्त है। गठबन्धन का इतिहास लिखनेवाली पार्टी ही आज गठबन्धन-धर्म का निर्वहन नहीं कर रही है, जिससे उसके घटक अब छटक रहे हैं।
देश की वर्तमान सरकार चलानेवाले दिवास्वप्न का सुख भोग रहे हैं। यही कारण है कि ‘धर्म’ की राजनीति करनेवाली यह सरकार अपनी सारी मर्यादा घोलकर पी चुकी है। भारत की राष्ट्रीयता रसातल में चली जाये, परन्तु येन-केन-प्रकारेण सत्ता पर अधिग्रहण बना रहे, यह है, भारतीय जनता पार्टी के शीर्षस्थ नेता नरेन्द्र मोदी का ‘आत्म चिन्तन’। यदि नहीं तो ‘विपक्ष-मुक्त’ सरकार की धारणा कथित मोदी के मन-मस्तिष्क की गहराई में पैठ कैसे गयी है? क्या यह एक प्रकार का ‘अधिनायकवाद’ और ‘निरंकुश तन्त्र’ नहीं है? क्या नरेन्द्र मोदी का वैसा सोच ‘लोकतन्त्र के हत्यारे’ के रूप में नहीं दिखता?
कल तक हिन्दुओं की आराधना करनेवाली यह पार्टी आज दलितों की भी आराधिका हो चुकी है। यही कारण है कि जब तथाकथित दलित जातियाँ २ अप्रैल, २०१८ ई० को ‘भारत बन्द’ की घोषणा की थीं तब केन्द्र और राज्य की सरकारों ने इसे गम्भीरता से नहीं लिया था; देश की प्रशासनिक और सुरक्षा-व्यवस्था-तन्त्र के अधिकारी ‘सिफ़लिस’ के रोगी की तरह से औंधे पड़े रहे; सुरक्षा की चाक-चौबन्द व्यवस्था करने में नाकाम रहे और अम्बेडकर की माला जपनेवाले देश में नंगा नाच करते रहे। ‘मन की बात’ सुनानेवाले बाज़ीगर के कानों में जूँ तक रेंग रहा है, क्योंकि देश को अराजकता की आग के हवाले करनेवाले गुण्डों-मवालियों से पंगा लेकर ‘अपना वोट बैंक’ खिसकाना नहीं चाहता, देश के लोग उन्मादियों के उपद्रव के चलते मारे जायें; राष्ट्र की निजी और शासकीय सम्पदा आग के हवाले कर दी जायें; जनसामान्य का जीवन अवरुद्ध कर दिया जाये, देश के सभी राजनीतिक दलों को मंज़ूर है, परन्तु दलित के नाम पर चमार, डोम, धिरकार, मेहतर, खटिक, पासी, कुर्मी इत्यादिक सम्पूर्ण देश में नंगा नाच करते रहें; देश के शीर्षस्थ न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध अपने हाथों में क़ानून लेते रहें, ये सभी ग़ैर-क़ानूनी कृत्य केन्द्र-राज्य की सरकारों को मंज़ूर है; यदि नहीं तो वे सरकारें मौन क्यों बनी रहीं? अनगिनत बार धिक्कार है, पक्ष और विपक्ष को!
दो दिनों पहले देश के कई राज्यों में साम्प्रदायिक दंगे हुए थे। बिहार भारतीय जनता पार्टी के नेता अश्विनी चौबे का बेटा साम्प्रदायिक दंगा भड़काने के लिए अपराधी सिद्ध हुआ; उसे जेल हुई। बिहार, गुजरात तथा राजस्थान में कराये गये दंगों के विरुद्ध देश का मुखिया नि:शब्द रहा और बंगाल के दंगे का अध्ययन करने के लिए दल बनाकर भेज दिया, क्यों? इसीलिए न कि बंगाल में भारतीय जनता पार्टी-शासित सरकार नहीं है?
कितनी दोगली और राष्ट्रघाती नीति है। तुम करो तो शाबाशी मिले और हम करें तो थू-थू के पात्र बनें; अपराधी क़रार दिये जायें।
वास्तव में, केन्द्र-सरकार की राष्ट्रघाती नीतियों के प्रभावस्वरूप भारत में ‘गृहयुद्ध’ का वातावरण बनने लगा है। उसमें जाति, वर्ग, सम्प्रदाय आदिक में दीर्घकाल तक न बुझनेवाली आग लगेगी, जिसमें मानव-सभ्यता झुलस कर रह जायेगी। उस आग में भारत के विपक्षी राजनीतिक दल घी अवश्य डालेंगे, वहीं साम्राज्य-विस्तारक चीन, पाकिस्तान आदिक भारत के शत्रु और अवसरवादी देश ‘भारतीयता’ की क़ब्र खोद डालेंगे। यदि ऐसा हुआ तो भारत पूरी तरह से जर्जर हो जायेगा। वैसे भी सभी विदेशी शत्रुओं की निगाहें भारत-सरकार की प्रत्येक गतिविधि पर स्थिर हो चुकी हैं। वैसी स्थिति में भारत पर चीन आक्रमण भी कर सकता है।
अत: हिन्दू और दलित की राजनीति छोड़कर समदर्शी बनने की समय-सत्य आवश्यकता है, अन्यथा भारत का ‘महाविनाश’ तय है।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; ३ अप्रैल, २०१८ ई०)