२ अप्रैल, २०१८ ई० को इलाहाबाद-स्थित ‘चन्द्रशेखर आज़ाद प्रतिमा-स्थल’ से ‘आरक्षणसमीक्षा मोर्चा’ की ओर से आरक्षणसमीक्षा-अभियान का आरम्भ भाषाविद् डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की अध्यक्षता में किया गया था, जिसका नेतृत्व मोर्चा के संयोजक वीरेन्द्र सिंह ने किया था। उस आयोजन में सैकड़ों की संख्या में वाराणसी, फतेहपुर, कानपुर, चित्रकूट, प्रतापगढ़ आदिक स्थानों से अपनी क्रान्तिधर्मिता का परिचय देने के लिए युवाशक्ति की भागीदारी थी।
इस मोर्चा की ओर से रचनात्मक स्तर पर समाज के सभी जातियों वर्गों, धर्मादिक के जनसामान्य को अपने साथ लेकर ‘आरक्षण के बने रहने के औचित्य’ पर विचार किया गया। इसका सबसे जीवन्त प्रमाण तब दिखा जब अध्यक्षता कर रहे डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने दो अलग-अलग कटे फ़ीतों को आपस में जोड़कर समीक्षाआन्दोलन-अभियान का उद्घाटन किया था, जिसका स्पष्ट सन्देश था : “हम तोड़ते नहीं, जोड़ते हैं।”
दूर-दूर से आये युवा-वर्ग में सत्ता और विपक्षी दल के नेता और विभिन्न संघटनों के पदाधिकारी भी सम्मिलित थे। उन सभी का मानना था कि आरक्षण से जिन परिवारों को लाभ मिल चुका है, उन्हें अब उसका लाभ नहीं दिया जाये।
ऐसे में, सर्वसम्मति से यह विचार किया गया कि दशकों तक आरक्षण के नाम पर मात्र दलितों और पिछड़े वर्गों को लाभ दिये जाने का औचित्य क्या है?ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों तथा आरक्षण के लाभ से वंचित अन्य सुपात्र, ज़रूरतमन्द जातियों-वर्गों को आरक्षण का लाभ लेने का अधिकार नहीं है? दशकों से राजनीतिक प्रश्रय प्राप्त जातियों और वर्गों के लोग लगातार आरक्षण का लाभ शिक्षा, परीक्षा तथा सेवा में लेते आ रहे हैं; कोटा का हक़दार बन रहे हैं और जो योग्य, मेधावी विद्यार्थी, अभ्यर्थी, परीक्षार्थी हैं, वे उनसे दोगुणा अंक प्राप्त करने पर भी आगे बढ़ने से रोक दिये जा रहे हैं। मेडिकल, इंजीनियरिंग, अन्य प्राविधिक शिक्षण के लिए तथाकथित जातियों और वर्गों के नितान्त अयोग्य के समक्ष देश की योग्यता पराभूत होती है। यही कारण है कि पहले की तुलना में प्रतिभा-पलायन की संख्या बहुत अधिक हो चुकी है।ऐसी स्थिति किसी ‘राष्ट्रीय शर्म’ से कम नहीं है।
राज्यों के उच्च न्यायालयों और शीर्षस्थ न्यायालय के सम्बन्धित न्यायाधीशगण ने पूर्ववर्ती और वर्तमान सरकार चलानेवालों से कई बार कह चुके हैं : सरकार बताये कि जिन्हें आरक्षण दिया जा चुका है, उन्हें अब आरक्षण देने का औचित्य क्या है? दशकों से जिन्हें आरक्षण का लाभ लगातार दिया जाता रहा है, अब उसकी समीक्षा कर सरकार न्यायालय को वस्तुस्थिति से अवगत कराये। इसके बाद भी पूर्ववर्ती और परवर्ती सरकारों के ठीकेदारों के कानों में जूँ तक नहीं रेंगा और न रेंग रहा है।
आरक्षण की समीक्षा की अवहेलना करते , ‘वोट की राजनीति’ के चलते, समीक्षा न कर, आरक्षण-अवधि बढ़ायी जाती रही है। इस तरह देश के सत्ताधारी और विपक्षी दलों-द्वारा बेहद घटिया और समाज को बाँटनेवाले षड्यन्त्र के अन्तर्गत अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़े वर्गों के हित में ‘एक स्वर में आरक्षण की आराधना’ दशकों से की जाती रही है। अत: यदि देश के सारे राजनीतिक दल धर्म, जाति, वर्गादिक की राजनीति से परे रहकर, सभी धर्मों, जातियों, वर्गादिकों को एक आँख से देखने का अभ्यास नहीं करते हैं तो उन्हें इस बात का एहसास कराने का अब समय आ गया है कि आरक्षण की वर्तमान अवधारणा को पंगु बनाना है। किसी भी धर्म, जाति, वर्गादिक से सम्बन्धित आर्थिक रूप से दुर्बल व्यक्ति को आरक्षण का लाभ दिलाना होगा। इतना ही नहीं, यदि ये खद्दरधारी सर्वसमाज के हित में अपनी नीति-नीयत में अन्तर नहीं लाते हैं और आरक्षण का लाभ देने के लिए समाज को विभाजित करनेवाली अपनी घटिया नीति में परिवर्त्तन नहीं करते हैं तो उन सभी राजनीतिक दलों को ‘आरक्षण का सर्वनाश’ करने के लिए ‘ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य’ को एक छत के नीचे आना होगा। ये तीनों शक्तियाँ ‘ब्रह्मा, विष्णु, महेश’ के प्रतीक के रूप में देश के सारे राजनीतिक दलों की आरक्षण-विषयक बेहद घिनौनी मानसिकता को ध्वस्त कर देंगी। यदि ये तीनों शक्तियाँ एक हो गयीं तो लगभग २५ प्रतिशत की जनसंख्या राजनेताओं की मुट्ठी में से बालू की तरह से सरक आयेगी और मात्र ‘सत्ता की राजनीति’ करनेवाले ऐसे क्लीव और कापुरुष नेता देखते ही रह जायेंगे, परिणाम और प्रभाव के रूप में ‘गोरखपुर’ और ‘फूलपुर’ के चुनाव-परिणाम को समझा जा सकता है, जिसे उक्त तीनों शक्तियों की उदासीनता की प्रतिक्रिया समझी जा सकती है अथवा किसी भयावह फ़िल्म का ट्रेलर, परन्तु जिस दिन से ‘आरक्षण की गर्हित नीति’ को नेस्तनाबूद करने के इरादे से तीनों शक्तियों ने ताल ठोंक लिया तो समझ लो, चुनावी परिणाम उनकी मुट्ठी में होगा, फिर वे ‘किंग मेकर’ की भूमिका में दिखेंगे।
कुछ वक्ताओं का स्पष्ट शब्दों में कहना था कि जो विधायक, सांसद, मन्त्री आदिक आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न हैं, उन्हें स्वत: ‘आरक्षण के लाभ’ को छोड़ देना चाहिए।
इतना ही नहीं, जो सांसद कैण्टीन में मात्र ४० रुपये में ‘मुर्ग़-मुसल्लम’ का भोग लगाते हैं और ख़ुद को दलित और पिछड़े वर्ग का बताते हैं, उन्हें आरक्षण के लाभ से वंचित रखा जाये।
मोर्चा की ओर से उसी दिन देश के राष्ट्रपति और प्रधान मन्त्री के पास ज़िलाधिकारी के माध्यम से एक ज्ञापन सौंपा गया था, जिसमें ‘आरक्षण की समीक्षा की माँग की गयी थी।
निकट भविष्य में इलाहाबाद के छात्रावासों में जाकर समस्त विद्यार्थीगण से मिलकर इस अभियान को बृहद् रूप देने का लक्ष्य है।