कुछ अंतर्मन की बातें

रचनाकार-पवन कश्यप 


गीतों ने की आज गर्जना कब तुम हमको गाओगे,
अंदर मेरा दम घुटता,कब मुखमण्डल पर लाओगे ।

कुछ कहने में अनायास ये होठ कांपने लगते है,
कुछ अंतस ने हिम्मत की तो शब्द झांपने लगते है
कुछ पीड़ा की बातों का घर्षण कैसे बतलाऊं मैं,
कुछ आंखों में दर्द छुपा बोलो कैसे दिखलाऊँ मैं।

अनुष्ठान चुप रहने का बोलो तुम कब तुड़वाओगे।

शायद तुमको मौन लुभाता फिर क्यों ऐसे हँसते हो,
मुझे कैद कर दीवारों में खुलकर तुम क्यों रहते हो।
चंदन की शीतलता का अब धैर्य नहीं रुक पायेगा,
मैं झुकता हूँ झुक जाऊं प्रतिबिम्ब नहीं झुक पायेगा।

प्रतिबंधों का ये गठबंधन कब तक और चलाओगे?

अडिग हिमालय सा तुमने क्यों अपना हृदय बनाया है,
तुमसे गिरते हिमखण्डों ने मुझको बहुत जलाया है ,
प्रेम यज्ञ की तपिश देखकर भव्य प्रणय क्यो रोक दिया
मात्र मुझे शाकल्य समझकर हवन कुण्ड में झोक दिया,

सभी तपस्याओं का फल तुम ही केवल क्या खाओगे।
अंतर्मन सब उलझा है तुम बोलो कब सुलझाओगे?