- पण्डित महावीर प्रसाद द्विवेदी भाषा-प्रबन्धन के कुशल हस्ताक्षर थे।
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी कवि, आलोचक, निबन्धकार, समर्थ सम्पादक तथा निजी सूझ-बूझ के सर्जक थे। साहित्य में विविधता का पुट लिये उन्होंने साहित्यिक, सामाजिक, राजनीतिक, ऐतिहासिक, वैज्ञानिक, आर्थिक, सामयिक आदिक विषयों पर अपनी लेखनी चलायी थी; उनमें विषय का विवेचन इतने आकर्षक ढंग से हुआ है कि पाठक-वर्ग के लिए विषय-वस्तु को हृदयंगम करना अत्यन्त सुगम हो जाता है। सूक्ष्म और गम्भीर बातों को सहज शब्दों में समझाने की उनमें अपूर्व क्षमता थी। बाल और किशोर-वर्गों के लिए उनके द्वारा लिखी गयीं पुस्तकें बाल-मन को बहुविध स्थापित करती हैं।
प्रमुख साहित्यिक पत्रिका ‘सरस्वती’ का सम्पादन कर, उन्होंने सम्पादन-कला की एक अभिनव शैली विकसित की थी।
द्विवेदी-युग के प्रवर्त्तक पण्डित महावीर प्रसाद द्विवेदी की जन्मतिथि के अवसर पर बौद्धिक, शैक्षिक, साहित्यिक तथा सांंस्कृतिक मंच ‘सर्जनपीठ’, इलाहाबाद की ओर से ९ मई, २०१८ ई० को एक वैचारिक परिसंवाद का आयोजन संस्था-कार्यालय अलोपीबाग़, इलाहाबाद में किया गया था, जिसका यह सार-संक्षेप रहा। बीज-भाषण करते हुए, भाषाविद् डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने कहा, “आचार्य के पास न तो शब्दों का अभाव था और न ही वे अनावश्यक शब्दों का प्रयोग करते थे। उन पर प्राय: कठोर तत्समवादी होने का आरोप लगाया जाता है, जो सर्वथा निर्मूल है। सच तो यह है कि वे न तो क्लिष्ट तत्समता के पक्षधर थे और न प्रतिदिन व्यवहार में आनेवाले विदेशी शब्दों के भण्डार के। यही कारण है की वे भावों-विचारों की स्पष्टता और भाषा-शुचिता के प्रति सदैव आग्रहशील लक्षित होते हैं।”
इलाहाबाद के पूर्व- हिन्दीविभागाध्यक्ष और समीक्षक प्रो० रामकिशोर शर्मा का मत है, “द्विवेदी ने हिन्दी-पत्रकारिता और हिन्दी के मानकीकरण के लिए जो कार्य किया था, वह स्मरणीय है। उनका प्रचुर कृतित्व साहित्य-अध्येताओं के लिए सदैव प्रेरक रहेगा।” शिक्षाशास्त्री-समालोचक डॉ० विद्याकान्त तिवारी का विचार है,”द्विवेदी जी ने अन्य साहित्यकारों की तुलना में बहुत अधिक नहीं लिखा है। उन्होंने साहित्य से अधिक साहित्यकारों को अपने मानक के अनुसार तैयार किया था। भाषा की अनुशासनहीनता को व्याकरणिक रूप देकर उसका परिष्कार किया था। यही कारण है कि उन्हें ‘द्विवेदी-युग’ कहलाने का गौरव प्राप्त हुआ था।” इलाहाबाद डिग्री कॉलेज के पूर्व हिन्दीविभागाध्यक्ष और समीक्षक डॉ० विभुराम मिश्र का मत है,”आचार्य द्विवेदी हिन्दी-खड़ी बोली के सर्जक थे। उन्होंने खड़ी बोली में प्रचलित विविध रूपों में एक मानक स्वरूप का निर्धारण किया था।” ज्ञानपुर डिग्री कॉलेज के पूर्व-हिन्दीविभागाध्यक्ष-आलोचक डॉ० क्षमाशंकर पाण्डेय का मानना है,”आचार्य द्विवेदी की भूमिका हिन्दी के साहित्यकारों की पीढ़ी की निर्माण की भूमिका है। वे हिन्दी-क्षितिज का विस्तार करते हैं।”
साहित्यकार डॉ० प्रदीप चित्रांशी ने बताया, “संस्कृत, बंगला, गुजराती,मराठी , फारसी इत्यादिक भाषाओं के ज्ञाता एवं हिन्दीभाषा के परिष्कारक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने हिन्दी-भाषा को व्याकरण-सम्मत बनाने का अभूतपूर्व कार्य किया है। ‘सरस्वती’ पत्रिका के संपादन का पद सँभालने के पश्चात् उन्होंने हिन्दी साहित्य को निखारा और उसकी गुणवत्ता में श्रीवृद्धि की। शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कानपुर की प्राध्यापक प्रो० वृत्तिका चतुर्वेदी ने कहा, “पण्डित महावीर प्रसाद द्विवेदी साहित्यवाटिका के एक कुशल माली थे। यही कारण है कि आज साहित्यसंसार में शब्द-सुरभि की अनुभूति हो रही है।” सहायक प्राध्यापक डॉ० राजर्षि कृतिका ने बताया,”आचार्य द्विवेदी को हिन्दी-साहित्यिक पत्रकारिता के आयाम को अभिनव दिशा देने का श्रेय जाता है।” इस बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने किया था।