डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
एक :
तन्त्र लोक का है कहाँ, चहूँ दिशा हैं चोर।
मुँह काला हो रात में, चन्दन चमके भोर।।
दो :
तन पाप में ख़ूब रमा, पुण्य नहीं है पास।
चेहरा है जल्लाद-सा, कैसे आये रास?
तीन :
सत्तासुख की चाह में, करते सभी उपाय।
दन्दी-फन्दी हर जगह, साधु बने निरुपाय।।
चार :
नेता नोचे देश को, दिखते मानो गिद्ध।
हरकत बगुला भगत-सी, लगते मानो सिद्ध।।
पाँच :
‘नीति’ छिछोरी दिख रही, ‘राज’ हुआ असहाय।
सत्ता संदूषित यहाँ, दिखते नहीं सहाय।।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; ३१ अक्तूबर, २०१८ ईसवी)