लेखिका:-जयति जैन “नूतन”
प्रकाशक:-अन्तरा शब्द शक्ति प्रकाशन इंदौर, मध्यप्रदेश
(मातृभाषा उन्नयन संस्थान के सौजन्य से प्रकाशित)
पृष्ठ:-32
मूल्य:-55/-
समीक्षक:-राजेश कुमार शर्मा “पुरोहित”
देश की युवा लेखिका व सामाजिक चिंतक जयति जैन”नूतन” की प्रस्तुत करती राष्ट्र भाषा और समाज के लिखने का मूल उद्देश्य हिंदी भाषा को प्रचारित एवं प्रसारित करना है।संविधान में हिंदी को राज भाषा माना गया है।कुल 22 भाषाएं राज भाषाओं के अंतर्गत आती है जिनमे हिंदी का स्थान सर्वोपरि है क्योंकि इसको बोलने वालों की संख्या ज्यादा है।हिंदी आज भी पूरे भारत की मातृभाषा नही बन पाई है अलग अलग राज्यों की अपनी अलग अलग भाषा है जैसे गुजराती, पंजाबी, बंगाली, कन्नड़, राजस्थानी, मराठी, तमिल, तेलगु इत्यादि है।आज बैंकों से लेकर स्कूल कॉलेजों में हिंदी का प्रचार प्रसार करने की आवश्यकता है।हमारे देश की राष्ट्रभाषा हिन्दी हो जो सम्पूर्ण राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करे।हमें अंग्रेजी भाषा का प्रयोग नही करना चाहिए।हिंदी को बोलचाल की भाषा बनाने की आवश्यकता है।प्रस्तुत करती की लेखिका ने पुस्तक की भूमिका में लिखा की लोगो के विचारों का आदान प्रदान करने के लिए हिंदी भाषा के अतिरिक्त अन्य कोई भाषा नही है।इस कृति में प्रकाशित रचनाओं के माध्यम से समाज में व्याप्त राष्ट्र भाषा के अतीत एवं वर्तमान से परिचय करते है।”राष्ट्रभाषा के लुटेरे “में लेखिका लिखती है की हमारे देश के अहिन्दी भाषी भारतवासी कभी नही चाहते कि हिंदी राष्ट्र भाषा बने दक्षिणी प्रदेशो के लोगो की मान्यता है कि राष्ट्र भाषा के तौर पर जिस दिन हिंदी स्थापित हो जाएगी तब अहिन्दी भाषी घाटे की स्थिति में आ जाएंगे।आजादी मिलने के बाद राष्ट्रपिता ने कहा था कि 6 महीने के अन्दर हिंदी देश की राष्ट्र भाष बन जाएगी।हिंदी साहित्य के सम्मेलन में गांधी जी ने कहा था जैसे अंग्रेज अंग्रेजी में ही बोलते है वैसे ही आप हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा बनाने का गौरव करे।वे हिंदी के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित थे।राममनोहर लोहिया ने कहा था अंग्रेजी को खत्म कर दिया जाए ।हिंदी ओर किसी भाषा को अपना ले लेकिन अंग्रेजी को नहीं।लेकिन आन तक भी भारत की कोई राष्ट्र भाषा नही है।हिंदी भाषा मे संस्कृत, फ़ारसी के कई शब्द समाहित है ।
गुलाम घोड़े रचना में आदिकालीन कवियों का नाम लेते हुए लेखिका ने लिखा कि आज के समाज में लोग हेमलेट और मैकबेथ को पढ़ रहे है जबकि तलसी, मीरा,कबीर को भूलते जा रहे हैं।हमारे संस्कृति पश्चात संस्कृति होती जा रही है।हैम सब थोपी हुई भाषा अपना कर बने गुलामी घोड़े हैं।हमने अपनी भाषा से ही मुँह मोड है अंग्रेजी भाषा शैली को जीवन में अपनाया है।हिंदी माध्यम में पढ़ने वाले विद्यार्थी जब महाविद्यालयों में आते है तो अंग्रेजी माध्यम में अध्ययन करना होता है उस दिन अहसास होता है कि न तो हम हिंदी के रहे न अंग्रेजी के।
हिंदी का बलात्कार में लिखा कि हिंदी हमारी अपनी भाषा है यह कहने वाले खुद अपने बच्चो को अंग्रेजी माध्यम में पढ़ा रहे है।हम एक दूसरे को हिंदी का महत्व समझ देते है साथ साथ हिंदी को अपमानित रोज ही करते है।देश की सांस्कृतिक सभ्यता को नष्ट करके किसी भी देश पर राज किया जा सकता है अंगेजो ने यही किया था जिसके कारण भारत 200 वर्षो तक उनका गुलाम बनके रहा।हमे यह चाहिए था कि हम अपनी मातृभाषा का प्रयोग करके उसे राष्ट्रभाषा में बदले लेकिन इस संभव नही हुआ।
“यह भी जाने” में लिखा कि आजादी के पहले से हिंदी को राष्ट्र भाषा बनाए जाने की लगातार कोशिशे जारी रही।लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, लाल लाजपतराय,पं. मदन मोहन मालवीय,महात्मा गांधी,राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन,काका कालेलकर,सेठ गोविन्ददास आदि ने बहुत प्रयास किये। हिंदी को राष्ट्र भाषा बनाने हेतु राजाराम मोहन रॉय ,आत्मरंग पांडुरंग, स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद,महात्मा गांधी,कर्नेल आलकाट जैसे अहिन्दी भाषियी जनों ने मिलकर प्रयास किया। हिंदी को सर्वमान्य भाषा बनाने में विभिन्न राज्यों,संस्थाओं,व्यक्तियों ने कार्य किया। सन 2001 की जनगणना के अनुसार 25.79 करोड़ भारतीय हिंदी का उपयोग मातृभाषा के रूप में करते है। विश्व में सर्वाधिक बोले जाने वाली भाषाओं में हिंदी का तीसरा स्थान हैं। स्वतंत्रता पूर्व व पश्चात हिंदी को राष्ट्र भाषा बनाने के लिए किए गए प्रयासों की विस्तृत जानकारी दी गई है।
साहित्य जगत में जब जब हिंदी के योगदान की बात आएगी। लेखिका की प्रस्तुत कृति “राष्ट्रभाषा और समाज” भी अपना महत्वपूर्ण स्थान बनाएगी। हिंदी के प्रचार एवम प्रसार के साथ ही अपने आधा दर्जन आलेखों को समेटे ये कृति अपनी अलग ही पहचान बनाएगी। मुखावरण आकर्षक है। प्रस्तुत कृति की भाषा सरल है। पाठकों को प्रारंभ से अंत तक बाँधे रखती है। गहन ज्ञानवर्धक जानकारीपरक आलेख बोधगम्य है।
युवा लेखिका को बहुत बहुत बधाई।
98,पुरोहित कुटी
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राजस्थान
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