कलमी लोगों के दौर में नयी क़लम : वीणा-नरेन्द्र

‘सुनिए वह धमाका जो शब्द और आदमी की टक्कर से पैदा होता है…’

मैं कोई आलोचक नहीं, पर तबियत से कवि न होने के बावज़ूद समय मिलने पर आम तौर पर मैं कविताएं पढ़ता रहा हूँ। आज पहली बार अनौपचारिक ही सही एक काव्य-चर्चा में शामिल होने का अवसर मिला। यह अवसर था वीणा सिंह और डॉ. नरेन्द्र शुक्ल की कविताओं के संकलन ‘क्या प्रेम तुमने भी किया है!’ के काव्य-पाठ का, जो ‘नेहरू स्मारक संग्रहालय एवं पुस्तकालय (NMML), तीन मूर्ति के एनेक्सी भवन में हुआ। जहाँ NMML के तमाम अध्येताओं के संग काव्य-चर्चा में सहभाग का अवसर मिला।

कवि-द्वय जब अपने आत्म-स्वीकरण में यह कहते हैं, ‘कि एक दूसरे के किये तमाम वायदों में हमने एक वायदा परस्पर को व्यक्ति के रूप में जीवित रखने का किया था।’ जाहिर है, इस तरह का वचन साथ-साथ और परस्पर उन्नयन के असीम संभावनाओं के द्वार खोलता है। निस्संदेह, यही उनकी कविताओं में भी परिलक्षित हुआ है।

20वीं से इक्कीसवीं सदी के संक्रमण के दौर में घटे उनके जीवन-रंग-प्रेम-रस-संघर्ष के भावों का सुख-दुःख, प्रेम-विरह, वेदना-संवेदना, याची-साक्षी संग ‘हम में समाए तुम’ के साथ-साथ समय और समाज की नपी-तुली सचाई की पैमाइश से परे एक अलौकिक, पर बेबाक अभिव्यक्ति हैं ये कविता संग्रह।

‘रेमाधव आर्ट’ से प्रकाशित वीणा जी की 48 और नरेन्द्र जी की 38 कविताओं के इस कविता संग्रह में शब्द, कभी प्रेम की रस्साकशी दर्शाते हैं, कभी विद्रोह की आवाज़ बन जाते हैं, कभी आत्मसमर्पण की अनुगूंज तो कहीं क्रान्ति की आवश्यकता और संभावनाओं में तब्दील हो जाते हैं। अज्ञेय की ‘असाध्य वीणा’ सी कुछ कविताओं में कवियित्री वीणा असाध्य सी दिखीं जिसे नरेन्द्र प्रियवंद बन साधते हैं। साधते क्या हैं बल्कि सत्य के संधान को आतुर दीखते हैं। प्रियंवद चकित है, (साथ ही हम भी) कि वीणा अब भी असाध्य है।

‘क्या प्रेम तुमने भी किया है!’ का हम जवाब खोजें, उससे पहले आइए आज के काव्य-पाठ पर कुछ चर्चा कर ली जाए। नरेन्द्र जी ने कविता पाठ से पहले बताया, ‘कि इन कविताओं में लिखने का प्रयास नहीं है, बल्कि यह जीवन के विविध पड़ावों पर ठिठके हुए कुछ भाव हैं।’

दरअसल उन दोनों के जीवन-रंग-प्रेम-रस-संघर्ष के यह भाव ही शब्द-चित्र बन कभी कविता, कभी मुक्तक, कभी गीत, कभी प्रगीत, कभी नज़्म और कभी ग़जल के रूप में इस काव्य-संकलन में शब्दाकार हुए हैं। और चूँकि कविता की शक्ति अनुभव की आँच होती है, इस मायने में यह काव्य-संकलन कविता की स्थापित परिभाषाओं के खाँचे से बाहर निकलकर ‘भाव, बुद्धि, कल्पना, शैली’ से लैस अभिव्यक्ति के खुले संसार में चहलकदमी करता है।

काव्य चर्चा में पढ़ी गयी पहली कविता वीणा की थी ‘क्या तुम मुझे खोज पाओगे?’ जिसमें जीवन के लिए वांछित भाव के अभाव की पीड़ा है, बानगी देखिए: ‘आज फिर मैंने खुद को तुममें बाँध लिया है/ देखो, सर से पाँव तक तमाम वृत्तों में…/तुम्हारे विश्वास को अपने प्रेम के/चटख लाल रंग में घोल/अपने क़दमों की दहलीज़ बना ली है…/आज जब तुम आना/ देखना मुझमे अपने होने को/ तुम्हारी तमाम परतों के पीछे छिपी/ मैं/ परत-दर-परत बिना किसी प्रतीक के…/ क्या तुम मुझे खोज पाओगे? (p18)

दूसरी कविता नरेन्द्र ने ‘स्मृति’ पढ़ी। अपनी लिखी कविता से संभवतः वह इसका उत्तर देने का प्रयास करते दीखते हैं: ‘…आकाश में तैरते/ बादलों के कुछ टुकड़े/ इनपर ये चमकीली छटा/ जरूर ये तुम्हारे/घर से गुजरे थे/ मेरे बालों पर/ चांदनी की इस/मरहमी छुअन में/ सच कहता हूँ/ हे सखी! तुम्हारा ही एहसास है…’(p124)

‘स्वीकार तुम्हारा’ (p 22) में वीणा जब कहती हैं। ‘…लिपि की परिधि छोड़/गीत बन बहते जाना/…अहम् की सीमा तोड़/ तमाम परों के संभावनाओं के द्वार हो जाना/ हाँ / जैसे स्वीकार तुम्हारा / मेरी मुक्ति का सन्देश हो।’ तो नरेन्द्र लिखते हैं: ‘…जिंदगी की कश्मकश में/ कश-दर-कश/ मौत को खींचते हुए ज़िन्दगी को/इतने पास महसूस करना/ ये तुम्हारे/ ‘तुम’ होने की सज़ा है!’ (p 98)

जहाँ वीणा ने अपनी कविताओं में किशोर लड़की के भोलेपन और प्रेम, युवती की दुविधा और संघर्ष, महिला की उम्मीद और संताप संग बहुतेरे रंगों को कामयाबी से उकेरा है, वहीं नरेन्द्र अपनी कविताओं में वैयक्तिक जीवन में घटी घटनाओं को भावना के स्तर पर घनीभूत करते दिखाई पड़ते हैं। प्रेम और ममत्व की कविताओं में वो सहज हैं, पर वैयक्तिक जीवन में घटी घटनाओं से प्रेरणा लेकर लिखी कविताओं में आत्माभिमानी साक्षी बन जाते हैं। पार्श्व में ही सही, पर कहीं कहीं समर्पण की अवस्था में भी पुरुषों में आमतौर पर हावी अहं की अनुगूंज उनकी कविताओं में बनी रहती है। समय-समाज का वह साक्षी, हाथ बढ़ाता है, साथी बनता है, साथ तो देता है, पर सरेंडर नहीं करता। मिसाल देखिए:

‘स्व-सत्य-ब्रह्मास्त्र से/ यह भ्रष्ट मेघ/ विच्छिन्न कर/ …हे मनुज/ तू सृष्टि कर’ (p102) या फिर मुक्तिबोध, निराला और प्रेमचंद को समर्पित ‘आत्मविसर्जन’ में। जहाँ नरेन्द्र ने जीवन-संघर्ष के क्षणों में अपनी साधना-आराधना का बड़ी ही प्रांजल भाषा में चित्रण किया है: ‘…उलझाव, उद्विग्नता/छटपटाहट से /…मुक्ति के लिए/बोध के लिए/…शक्ति के लिए/पूजा के लिए/…कलम के सिपाही की/…कर्म के लिए/ भूमि के लिए/…वह अहोरात्र-सर्जन/ और सर्जक का आत्मविसर्जन।’(p100)

माँ मजबूत पक्ष है नरेन्द्र और वीणा के जीवन में, एक अक्षय उर्जा का स्रोत। ममत्व का अविरल सोता जहाँ से वो दोनों जब-तब संजीवनी लेते रहते हैं। समाज में लड़कियों से होने वाले भेदभाव से नाख़ुश वीणा जब हताश हो कहती हैं ‘माँ/ एक बार फिर धारण कर लो मुझे।’(p 30)’ वहीं दूसरी ओर नरेन्द्र माँ की मुस्कान में छिपी उषा की अरुणिमा के दर्शन करते हैं: ‘…माँ /क्षण-क्षण जागती है/ जागते हुए सब बड़ा करती है/ और जब सोती है/ तो दिखती है उसके गालों की झुर्रियां/…पर जैसे ही वह जागती है/ वह झुर्रियां/ उसकी मुस्कुराहटों से बनी धारियों में सिमट/ गौरवगाथा बन जाती हैं।’ (p77)

प्रेम और वात्सल्य से आगे एक और रंग देखिए। वीणा की ‘माँ फिर धारण कर लो मुझे’ कविता में समाज में आमतौर पर प्रचलित लैंगिक भेदभाव से पीड़ित एक लड़की के स्वर सुनाई पड़ते हैं, यह एक हारी हुई लड़की का स्वर है, लेखनी में बेबसी और आत्मसमर्पण का भाव है: ‘…अबकी बार/ शर्म तुम्हारी आँखों का बनूँगी/ विचारवान-संस्कारवान/ भीड़ बन जाऊँगी/ जिधर हांकेगा समाज/ बिना प्रश्न किये/ उधर ही चली जाऊँगी/ नहीं मांगूंगी अपने हिस्से का आकाश/… सच कहती हूँ/ अबकी बार सच नहीं बोलूंगी/ माँ/ एक बार फिर धारण कर लो मुझे।’(p 30)

एक अन्य कविता ‘वो तोड़ रही हैं’(p62) में वीणा ने विद्रोही स्वर में पितृसत्ता की नींव पर पूरी ताक़त से फावड़ा चलाया है, जब वो समूची औरत जाति का प्रतिनिधित्व करती दीखती हैं ‘…मैं औरत हूँ,/ मेरे भीतर और बाहर पल रही है तुम्हारी संस्कृति/… और ‘तुम’-‘पुरुष’/ मेरे देह-द्वार पर/ कर रहे हो चौकीदारी/ अपनी संस्कृति की।’

और फिर आगे की पंक्तियों में एक विकल्प देते हुए मानों पितृसत्ता के सदियों से स्थापित तर्कों/आस्थाओं/बहानों को पाखण्ड करार देती हैं: ‘…सुनो! तुम क्यों नहीं बदल लेते/ परस्पर अपनी भूमिका मेरी औरत संतानों से/ कुछ सदियों तक तुम स्वयं/ क्यों नहीं पाल लेते अपनी संस्कृति अपनी देह में/… मैं पूरी समता से करुँगी चौकीदारी/ तुम्हारे देह-द्वार की/ मैं भी सुनाउंगी तुम्हारे त्याग और समर्पण की कहानियां/…और/ तुम्हारे दुःख और संताप को/ करुँगी पूरी ईमानदारी से लिपिबद्ध।’ यह कविता सभ्यता के आवरण को भेद कर संस्था-व्यवस्था के मूल में बसी सचाई के आदिम रूप को हमारे सामने उघाड़ कर रख देती है।

अन्यायियों के विरुद्ध एक जगह नरेन्द्र ईश्वर को सलाह देते दीखते हैं,: ‘…अगर तू इनको सज़ा नहीं दे सकता/ तो कम-से-कम ऐसा कर, कि/ ये बेबस लाचार मानव/ अपने अस्तित्व की खैरात न मांगे/ अपने अस्तित्व का अधिकार मांगे।’ (p80)

‘वह घिसती पत्थर’ में नरेन्द्र निराला की ‘वह तोड़ती पत्थर’ से आगे समय की एक लम्बी छलांग लेते हैं। निराला के इलाहाबाद की युवती, लखनऊ की अब एक प्रौढ़ महिला है, उसका बच्चा बड़ा हो गया है, केवल मशीन बदली है, वेदना का स्तर वहीं है। कविता में कवि जिस घटना का साक्षी है उसमें बाह्य-दृश्य के साथ-साथ उसका तनाव भी है: ‘…वह बच्चा, जो तब था छोटा/ सड़क के किनारे रोता/ आज है पत्थर ढोता/ देता जाकर मां को और कहता/… ले माँ घिस/ और घिस अपनी किस्मत को/…पेट तो भरेगा नहीं/ हो सकता है/… निराला की संवेदना आंसू बन बहे/…और शायद प्यास ही बुझ जाए।’(p82)

मुक्तकों और कविताओं से अलग शैली एक ग़ज़ल सी रचना ‘किश्तों में बिक रहा हूँ मैं’ में नरेन्द्र उसी अधिकार से उतरते हैं : ‘…बोली लगाने वालों/ लगा रहे हो/ तो सुन/ एक बार बिक चुका है पीर/ अपने मुरीद पर।’ एक दूसरी जगह पर वो लिखते हैं: ‘…चल तू भी/ क्या याद रक्खेगा/ मेरी दरियादिली/ ऐ मीर/ लो तख़्त पे सज़ा रहा हूँ/ मैं-अपना ज़मीर/ किश्तों में बिक रहा हूँ मैं।’(p134)

मानव ने अपने विकासक्रम में क़द घटा लिया। बराबरी और भाईचारे के भाव को तिलांजलि दे केवल ‘मैं’ ‘मैं’ की आवाजे करते समाज की ‘हम ही हम’ की प्रवृत्ति पर चोट करती नरेन्द्र जी कविता देखिए: ‘आम्रमंजरियों पर अब कोयलें नहीं कूकतीं /क्योंकि पौधे अब कलमी होने लगे हैं, और आदमी/ उतना ही बौना।’(p81)

ऐसे ही बहुतेरे रंगबिरंगे तेवरों-कलेवरों से सनी कविता-मुक्तक-गीत-प्रगीत-नज़्म का पठनीय एवं संग्रहणीय संकलन है यह काव्य संग्रह, जो पाठक के मन को झिंझोड़ते हुए वाजिब सवाल पूछती है, ‘क्या प्रेम तुमने भी किया है!’

तो स्वागत कीजिए कलमी होते लोग-समाज के दौर में इस नई क़लम का जो भाव-अभिव्यक्ति-अभिव्यंजना की नई ज़मीन तोड़ती है। मैं कर रहा हूँ, और कारण स्पष्ट है: ‘जी हाँ, प्रेम हमने भी किया है!!!’

ऑनलाइन मंगाने के लिए नीचे लिखे लिंक पर चटका लगाइए:
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नोट-1: इस पोस्ट के शीर्षक की पहली लाइन ‘सुनिए वह धमाका जो शब्द और आदमी की टक्कर से पैदा होता है…’ केदारनाथ सिंह की कविता ‘मुक्ति’ से प्रेरित है।

नोट-2: संलग्न चित्र में दोनों कुर्सियों के बीच रखा फूलदान अनायास नहीं है, यह सायास प्रयास है ‘बहुतेरी पंखुड़ियों सी ढेरों कविताओं के संग्रह’ का ‘फूलदान में रखे डहेलिया’ से साम्य दिखाने का। सनद रहे संग्रह के कवर पेज पर भी डहेलिया ही है।😊