आग : सच बता तू अपने से कब लगी ?

महेन्द्र महर्षि, गुरुग्राम (से.नि. वरिष्ठ प्रसारण अधिकारी, दूरदर्शन)

क्याऊं-क्याऊं, तेज साइरन,
बेचैन सी भागती
अग्निशमन की मोटरें ,
एक के पीछे एक ,
मेरे घर के समीप
की सड़क से
गुज़र गईं।
मैंने अपने से ही पूछा-
कहाँ लग गई ?
जहां लगी थी,
भीड़ भी वहीं
लग गई।
बाद में पहुँचने वाले
पहले वालों से
पूछ रहे हैं –
कैसे लगी?
जितने मुँह उतनी बात।
शायद
शार्ट सर्किट से,
नहीं मैंने धमाका सुना,
गैस सिलेंडर होगा।
बुरे दिन हैं
बम फटा लगता है।
नहीं जहां लगी है
वहाँ तो ,
केस की फ़ाइलें थीं –
बड़े घपले हैं।
जहां भी लगती है,
कोई वजह होती है।
पैट्रोल पंप पर लगी
किसी ने लाइटर
सुलगा लिया।
बैंक में लग गई,
अकाउंट में हेराफेरी थी।
अस्पताल में लगी,
डेंगू के मरीज़ नाराज़ थे।
जंगल में लगी,
सूखे बांस ,
हवा ने रगड़ दिए।
ट्रेक्टर से चिनगारी
निकली खेत में लगी।
झुग्गी में लगी,
डिबरी की लपट,
फूँस में लग गई।
ट्रेन में लग गई,
पता नहीं चला।
आयुध डिपो में लगी,
ड्रोन हमला हुआ।
ट्रेड टावर में लगी,
आतंकी जहाज़ घुस गए।
महाभारत !!
अरे –
अंदर तक लग गई,
द्रोपदी जो हंसी।
वग़ैराह-वग़ैराह।
आज-
अगर-मगर न करना,
आग !
मुझे बता!
सच-सच बता !
तू अपने से ,
कब लगी ?