पृथ्वीनाथ पाण्डेय
एक :
बेतरतीब बनती जा रहीं रिश्ते की ज़ंजीरें,
किसी बच्चे की चाहत-मानिन्द उलझी हुईं।
दो :
आँखों ने आँखों से गुफ़्तुगू क्या कर ली महफ़िल में,
फ़क़त बात इतनी थी मगर अफ़साना बन गया।
तीन :
तुम ठहरो, जाओ वा लौट आओ, फ़र्क़ नहीं,
मेरी मंज़िल का पता बेशक, मुझे मालूम है।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; ११ मार्च, २०२० ईसवी)