एक गिलास ठंडे पानी के लायक भी नहीं समझते मज़दूरों के हक़ की बात करने वाले

राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी ‘राघव’-

समाजवाद रो रहा है । मानवाधिकार मिट गये । ऊपर वाले तेरी कायनात बंट गयी । हमारे लिए संस्कृति की दीवार बनाने वाला वह कर्म का पुजारी आज दुर्दिनों में है । आज नंगा, भूखा, बिना घर के ये मानवता की असली तस्वीर दिखा रहा है । जो अपने को गला कर खेतो में अनाज उगाता है । तपती धूप में हमारा घर बनाता है । कारखानों में पिसता है । अरे ! छोटे बड़े सारे काम तो यही करता है । पर हाय री किस्मत ! अन्नदाता भूखा सोता है । उसे एक गिलास ठंडे पानी के लायक भी नहीं समझने वाले मज़दूरों के हक़ की बात करते हैं । ये तो सच्चे अर्थ में धरती के देवता हैं और ईश्वर रूप हैं । ईश्वर तो प्रेम का भूखा है और थोड़ा पाकर भी तृप्त हो जायेगा और समझ लेगा कि अभी पृथ्वी पर उसके अवशेष में मानव शेष है ।