साहब ! मज़दूर मर रहा है

शिवांकित तिवारी ‘शिवा’ (युवा कवि एवं लेखक), संपर्क : 9340411563 shivankittiwari1999@gmail.com     

श्रमिक हमारे समाज की एक ऐसी मजबूत रीढ़ है जिस पर समस्त आर्थिक उन्नति टिकी होती है और जो मानवीय श्रम का सबसे आदर्श उदाहरण है। हमारे सभी प्रकार के क्रियाकलापों की वह सबसे विशेष धुरी होता है जिसके द्वारा हमारे समस्त कार्य पूरे किए जाते है। आज के आधुनिकीकरण एवं मशीनी युग में भी उसकी महत्वता कहीं भी कम नहीं हुई है। आज भी उद्योग, व्यापार,कृषि, भवन निर्माण, पुल एवं सड़कों के निर्माण आदि समस्त कार्यों  में विशेष रूप से मजदूरों के परिश्रम की आवश्यकता होती है और उनके महत्त्वपूर्ण योगदान से ही सारे कार्य अंज़ाम तक पहुंच पाते है।

श्रमिक अपना श्रम बेचता है और उसके बदले में वह न्यूनतम मजदूरी प्राप्त करता है। उसका जीवन-यापन भी दैनिक मजदूरी के आधार पर होता है। जब तक वह श्रम कर पाने में सक्षम होता है तब तक उसका गुजारा होता रहता है और जिस दिन वह अशक्त होकर काम छोड़ देता है, उस दिन से वह दूसरों पर निर्भर हो जाता है। भारत देश में कम से कम असंगिठत क्षेत्र के मजदूरों की तो यही स्थिति है साहब। असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की ना केवल मजदूरी कम होती है बल्कि उन्हें किसी भी प्रकार की कोई सामाजिक सुरक्षा भी प्राप्त नहीं होती।

लॉकडॉउन में मजदूरों की वर्तमान हालत:- पहले खूब पसीना बहाते थे। मेहनत और ईमानदारी से कमाते थे। तब घर का चूल्हा जलता था और तब कहीं जाकर पेट की भूख मिटती थी लेकिन आज बस मुसीबत से जूझ रहे हैं। कोई मीलों पैदल चल रहा है…कोई बीच में ही टूट कर बिखर रहा है…कोई भूख से लड़ रहा है…कोई सिस्टम से हार रहा है…किसी की नौकरी छूट गई, किसी के सपने टूट गए…कोई रोड पर भूख की खातिर रोटी मांग रहा है, कोई ठेले पर सब्जी बेच रहा है…जी हां, कोरोना के प्रहार ने मजदूरों को बिल्कुल बेजार कर दिया है। जिंदगी को चौराहे पर खड़ा कर दिया है। इस बार का मजदूर दिवस, बस कैलेंडर की तारीख बन कर रह गया है। महामारी की मार ने पारंपरिक हुनर के दम पर रोजी-रोटी कमा रहे श्रमिकों को खुद को बदलने पर मजबूर कर दिया है। काम-धंधा ठप होने से बाजार में न तो इनकी कोई जरूरत बची है और न ही इनके हुनर की कोई कीमत। अब ज़िंदगी इस की जंग में खुद को बचाये रखने के लिए इस महामारी में भी मजदूर भूख से जंग लड़ रहे हैं। ऐसे हार कर बैठ जाने के बजाय नई राह भी निकाल रहे हैं। कुछ अब कर्ज लेकर सब्जी बेच रहे है तो कुछ दूध बेच रहे है और कुछ अख़बार बेंच कर अपना और अपने परिवार का भरण – पोषण कर रहे हैं। करे भी तो क्या करें पेशे से ठहरे मजदूर और वर्तमान हालत से पूरी तरह मजबूर। फिर भी बेचारे स्वाभिमानी और ईमानदारी जिंदा रहने के लिए कुछ ना कुछ करके अपना और परिवार का गुजारा कर रहे है।

यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन के आंकड़ों के अनुसार इस लाॅकडाउन का सबसे गहरा असर कोई 40 करोड़ मजदूरों पर जिनका देश की अर्थव्यवस्था में सबसे महत्वपूर्ण योगदान है उन पर प्रमुखतया पड़ेगा और वे फिर से त्रासद गरीबी के गर्त में धीरे – धीरे धंसते चले जायेंगे। हालांकि यह भी सच है कि भारत सरकार की सीमित क्षमताओं की वजह से सभी प्रवासी एवं दिहाड़ी मजदूरों पर ध्यान दे पाना इतना आसान भी नहीं है मगर सरकार को इनके लिए एवं इनके जीवन को सुरक्षित रखने हेतु अब जल्द से जल्द विशेष कदम उठाने चाहिए साथ ही इन्हें इनकी जरूरत के मुताबिक समस्त चीजें भरपूर मात्रा में उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए ताकि इस वैश्विक महामारी के दौर में इनका और इनके परिवार का जीवन सुरक्षित रह सके ।