पण्डित प्रभात शास्त्री धारा-प्रवाह संस्कृत-सम्भाषण करने में दक्ष थे– विभूति मिश्र

देववाणी संस्कृत-भाषा में पच्चीस ग्रन्थों– ‘अध्यात्म रामायण’, ‘रामगीतागोविन्दम्’, ‘गीताशंकर’, ‘संगीतमाधवम्’, ‘राहुलरचनामृतं’, ‘गीतगिरीशम्’ आदिक के सम्पादक ‘शास्त्रचूणामणि’ से अलंकृत; ‘संगमनी’ नामक पत्रिका के विश्रुत सम्पादक तथा हिन्दी साहित्य-सम्मेलन प्रयाग’ के विद्वान् निवर्तमान प्रधानमन्त्री पण्डित प्रभात शास्त्री की जन्मतिथि २७ मई के अवसर पर बौद्धिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक तथा सामाजिक मंच ‘सर्जनपीठ’ की ओर से एक ‘ऑन-लाइन’ बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन किया गया, जिसका विषय था– ‘संस्कृत-भाषा और साहित्य के उन्नयन में पं० प्रभात शास्त्री का योगदान’।

विभूति मिश्र
(प्रधानमन्त्री : हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग)

समारोह की अध्यक्षता कर रहे पं० प्रभात शास्त्री के सुपुत्र और हिन्दी साहित्य सम्मेलन के वर्तमान प्रधानमन्त्री विभूति मिश्र ने बताया,”मैं बाबू जी को बचपन से देखता रहा। संस्कृत-भाषा के प्रति उनकी निष्ठा देखते ही बनती थी। धाराप्रवाह संस्कृत-सम्भाषण करने में वे दक्ष थे। वेद-वेदान्तों तथा अन्यान्य शास्त्र-पुराणों के अनुवाद करने तथा संस्कृत-भाषा में किसी भी विषय पर शास्त्रार्थ करने में वे सिद्ध-हस्त हस्ताक्षर थे।”

डॉ० रहसबिहारी द्विवेदी
(संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान्)

संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान् डॉ० रहसबिहारी द्विवेदी ने मुख्य अतिथि के रूप में बताया, “मेरे पिताश्री ज्योतिषाचार्य पं० रामाभिलाष द्विवेदी प्रभात जी के मित्र थे। मैं पिता जी के साथ दारागंज-स्थित उनके निवासस्थान पर जाया करता था और श्लोक-रचना सीखता था। उन्होंने रागकाव्यों की जितनी भूमिकाएँ लिखी थीं, उनका संग्रह कर ‘रागकाव्यविमर्श:’ का प्रकाशन हुआ था, जिसकी भूमिका मैंने लिखी थी। उनकी शैली में अद्भुत शास्त्रीयता थी।

डॉ० आनन्द कुमार श्रीवास्तव
(संस्कृत-अध्येता-मर्मज्ञ तथा सी०एम०पी० डिग्री कॉलेज, प्रयागराज के निवर्तमान प्रधानाचार्य)

संस्कृत-अध्येता-मर्मज्ञ और सी०एम०पी० डिग्री कॉलेज, प्रयागराज के निवर्तमान प्रधानाचार्य डॉ० आनन्द कुमार श्रीवास्तव का विशिष्ट अतिथि के रूप में मत है, “पं० शास्त्री जी ने ‘अध्यात्म रामायण’ की टीका की आलोचना जिस सूक्ष्मता के साथ की है, वह उनके दृष्टि-वैभव का विस्तार करता है। मेरा शोधविषय ‘आधुनिक संस्कृत-काव्यशास्त्र’ था। उस सन्दर्भ में मैं उनसे मिला था। उन्होंने मुझे अपना सम्पादित ग्रन्थ अध्यात्म रामायण दिया था। उसमें आत्म और ब्रह्मपरक जो शास्त्रीय तथ्य संश्लिष्ट थे, उनको अपने ज्ञान के आधार पर जनसम्प्रेषणीय बनाया था।”

डॉ० पद्माकर मिश्र
(अवकाश-प्राप्त संस्कृत-प्राध्यापक : इविंग क्रिश्चियन डिग्री कॉलेज, प्रयागराज)

संस्कृतभाषा-विशेषज्ञ डॉ० पद्माकर मिश्र का मत रहा,”पण्डित शब्द का अलंकरण प्राय: लोग बिना उसकी महत्ता जाने-समझे लगा लेते हैं; परन्तु आचार्यत्व को सिद्ध करनेवाले प्रभात शास्त्री वास्तव में, एक पण्डित थे, जिनका पाण्डित्य उनकी मौलिकता, संस्कृत-ग्रन्थों के अनुवाद तथा सम्पादनकला-शैली को रेखांकित करता है।”

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(संयोजक-संचालक)

परिसंवाद संयोजक भाषाविद्-समीक्षक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने बताया,” पं० प्रभात शास्त्री सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के शिष्ट परिषद् और कार्यपरिषद् के सम्मानित सदस्य भी थे। उन्हें उत्तरप्रदेश संस्कृत अकादमी-द्वारा सम्पादित पुस्तकों के लिए तीन बार पुरस्कृत किया गया था तथा तत्कालीन राष्ट्रपति ने संस्कृत-पाण्डित्य और शास्त्र-मर्मज्ञता के लिए उन्हें आभूषित किया था।”

अन्त में संयोजक ने सहभागियों के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट की।