आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला

साहित्यिक संस्थान ‘हिन्दुस्तानी एकेडेमी’-द्वारा अक्षम्य अशुद्ध शब्द-प्रयोग और व्याकरण की अवहेलना

विशेष– आप ऊपर दिख रहे निमन्त्रणपत्र मे घेरे गये शब्द और वहाँ अंकित (६) अंक की गणना न कर, घेरे गये (७) को (६) मानकर आगे के सभी संख्याओं मे से एक अंक को घटाकर अशुद्धियों को समझें।
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‘हिन्दुस्तानी एकेडेमी’, प्रयागराज के ऊपर दिये गये निमन्त्रण-पत्र में मुद्रित अशुद्धियाँ (कारण-सहित ) और उनके शुद्ध प्रयोग देखें और समझें :–
१- ‘मान्यवर’ के आगे अल्प विराम (,) का चिह्न नहीं लगेगा, बल्कि सम्बोधन का चिह्न (!) लगेगा।
२- ‘तत्वावधान’ के स्थान पर ‘तत्त्वावधान’ होता है।
३- 12 फ़रवरी के बाद अल्प विराम का चिह्न (,) लगेगा।
४- 3 :०० के स्थान पर 3 बजे होगा। 3 : 00 मात्र घड़ी के लिए है; क्योंकि वहाँ पर मिनट-सेकण्ड का विवरण रहता है; वहीं 3 को 00 से चिपका कर अंकित किया गया है।
५- कार्यक्रम और स्थल के मध्य ‘षष्ठी तत्पुरुष का सामासिक चिह्न’ (-) प्रयुक्त होगा।
६ – एकेडेमी सभागार का अर्थ है– ‘एकेडेमी का सभागार’, अतः एकेडेमी और सभागार के मध्य ‘षष्ठी तत्पुरुष का सामासिक चिह्न’ (-) प्रयुक्त होगा |
७- निर्धारित विषय एकल उद्धरण चिह्न (‘ ‘) के अन्तर्गत नहीं रहेगा। यदि कई वाक्यों के मध्य एक ही शब्द-आकार में इसका प्रयोग किया जाता तो अलग से विषय को रेखांकित करने के लिए ‘एकल उद्धरण चिह्न’ का प्रयोग मान्य रहता। यहाँ तो विषय स्पष्ट है।
८- ‘डॉ.’ के आगे प्रयुक्त ‘लाघव विराम चिह्न अँगरेज़ी का है, जबकि ‘ड’ व्यंजन हिन्दी का है और किसी भी हिन्दी-अक्षर के आगे प्रयोग के आधार पर ‘लाघव विराम चिह्न’ हिन्दी (०) का ही प्रयुक्त होगा | इसप्रकार शुद्ध प्रयोग ‘डॉ०’ होगा।
९- तत्व कोई शब्द नहीं है, शब्द है– ‘तत्त्व’।
१०- पूर्व अध्यक्ष का अर्थ है– पूर्व का अध्यक्ष, पहले का अध्यक्ष। यहाँ पर पूर्व और अध्यक्ष के मध्य ‘षष्ठी तत्पुरुष के सामासिक चिह्न’ (-) का प्रयोग होगा।
११- ‘उ०प्र०’– ये दोनों अक्षर आपस में मिले हुए हैं, जबकि लाघव विराम चिह्न लगते ही दोनों अक्षर दूर-दूर हो जाते हैं; जैसे– उ० प्र०।
१२- उपर्युक्त की तरह यहाँ भी इ०वि०वि०– कुछ दूरी पर रहेंगे।
१३- यहाँ भी ‘क्रम-संख्या ‘८’ की ही दोष-आवृत्ति है।
१४- ‘पूर्व निदेशक’ में भी ‘क्रम-संख्या १०’ की ही भाँति अशुद्धि व्याप्त है।
१५- ‘ऐतिहासिक उपन्यासकार’– यहाँ उपन्यासकार के साथ ‘ऐतिहासिक’ विशेषण का प्रयोग तथ्य-तर्क-असंगत है और हास्यास्पद भी; ऐसा इसलिए कि साहित्यकार किसी क्षेत्र-विशेष का नहीं होता। एक-से-बढ़कर-एक ऐतिहासिक उपन्यास और नाटक लिखनेवाले रहे हैं; किन्तु उन्हें कभी ऐतिहासिक उपन्यासकार और नाटककार के रूप में रेखांकित नहीं किया गया है ; वे मात्र उपन्यासकार और नाटककार रहे हैं। जयशंकर प्रसाद और वृन्दावनलाल वर्मा को उपन्यासकार कहा गया है, न कि ‘ऐतिहासिक उपन्यासकार’। सर्जक मात्र समाज का, समाज के लिए तथा समाज के द्वारा होता है।
१६- निवेदक– इसका अर्थ है– निवेदन करनेवाला, जो कि ‘एकवचन’ का शब्द है किन्तु यहाँ दो निवेदक हैं, अतः निवेदक के स्थान पर ‘निवेदक-द्वय’ होगा।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ९ फरवरी, २०२२ ईसवी।)