— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
दो ही जातियाँ हैं :— पहली, महिला (प्रकृति) की और दूसरी, पुरुष की; परन्तु ‘दोगलों’ की कोई जाति नहीं होती, जो ‘रंग और रूप’ बदलने में माहिर होते हैं। जैसे हाथी के दो दाँत होते हैं :– पहला, दिखानेवाला होता है, जो बाहर की ओर निकला रहता है और दूसरा, खानेवाला होता है, जो अन्दर की ओर रहता है; वैसे ही दोगलों के दो गले होता हैं :– पहला, जो आदर्शवाद का भजन करता है और दूसरा, जो अवसर के पीछे-पीछे चलता है।
प्राय: देखा गया है कि अधिकतर उच्चपदस्थ लोग जब तक सेवा-कर्म में रहते हैं तब तक सब-कुछ ग़लत होते हुए भी, खुली आँखों से देखते रहते हैं; सुनते रहते हैं तथा करते रहते हैं; वे अपनी आँखों पर पट्टियाँ बाँधे रहते हैं; कानों में ठेपियाँ चिपकाये रहते हैं तथा होठों को सिले रहते हैं; फिर जैसे ही सेवामुक्त होते हैं, ‘बादशाह’ बन जाते हैं; उन्मुक्त प्रवक्ता बन जाते हैं; तत्कालीन शासन-व्यवस्था के विरुद्ध पुस्तकें लिखने लगते हैं; पत्र-पत्रिकाओं में उन्हीं विसंगतियों और पापाचरण की भर्त्सना करते हैं, जिनका वे अपने कार्यकाल में पोषण करते आये थे।
आज, जब समाचार-चैनलों पर अपने समय के प्रख्यात पत्रकार वर्तमानकालीन पत्रकारिता पर अँगुलियाँ उठाते हैं तब वे भूल जाते हैं कि उनकी नज़रों में आज जिस प्रकार की अनैतिक और अपरिपक्व पत्रकारिता लक्षित हो रही है, उसे खाद-पानी देकर पुष्ट करने में उनका भी योगदान रहा है; वह चाहें भाषा की रही हो, समाचार-संज्ञान की रही हो अथवा प्रशिक्षण की रही हो।
सेवानिवृत्त वरिष्ठ पुलिस और सैन्य अधिकारी समाचार-चैनलों पर वर्तमान राजनीति में व्याप्त आपराधिक गतिविधियों के लिए राजनेताओं और ‘सिस्टम’ को अपराधी बताते हैं। उनसे प्रश्न है, अपने सेवाकाल में राजनेताओं के तलुए चाटते हुए, ‘सिस्टम’ की आरती उतारते हुए, राजनीति में अपराध को किसने आने दिया था? तब ऐसे पुलिस और सैन्य अधिकारी मान-सम्मान को घूरे में डालकर, दुम हिलाते हुए, ‘कक्षा आठ फेल’ विधायकों-सांसदों-मन्त्रियों के आगे-पीछे घूमते हुए, उनके और समाज के लिए ‘अपराधी’ क्यों तैयार करते थे?
ऐसे चरित्र-चाल-चेहरेवाले ‘भूत’ अधिकारी भी समाज को गर्त में ले जाने के लिए उतने ही उत्तरदायी हैं। इससे कोई भी इंकार नहीं कर सकता।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ११ अगस्त, २०२० ईसवी)