‘साहित्यांजलि प्रज्योदि’ और ‘सर्जनपीठ’ का ‘भाषारस-गागरी’ राष्ट्रीय महोत्सव सम्पन्न

भाषारस ले गागरी चली पिया के देश

‘साहित्यांजलि प्रज्योदि’ और ‘सर्जनपीठ’ की ओर से १५ सितम्बर को ‘भाषारस-गागरी राष्ट्रीय महोत्सव का आयोजन ‘सारस्वत सभागार’, लूकरगंज, प्रयागराज में कवि-कवयित्री सम्मेलन के रूप में किया गया। उससे पूर्व ‘साहित्यांजलि प्रज्योदि’ के संरक्षक और विचारक स्मृतिशेष सुरेशचन्द्र श्रीवास्तव जी की पुण्यतिथि पर उनके पुत्र अंशुमान सिंह ने उनका भावपूर्ण स्मरण किया। अनेक वक्ताओं ने भी उनकी सादगी और महती उपलब्धियों पर प्रकाश डाले थे।

वरिष्ठ पत्रकार और कवयित्री उर्वशी उपाध्याय ने अध्यक्षता करते हुए हिन्दी की महत्ता को काव्यरूप दिया– हमें माला में गूँथे जो, वही एक तार हिन्दी है। मेरे भारत की भाषा है, मेरी पहचान हिन्दी है।

विशिष्ट अतिथि और आकाशवाणी, इलाहाबाद के निदेशक लोकेश शुक्ल ने सुनाया– गीत-ग़ज़ल कोमल हैं कितने, छन्दों की गहराई है। कविता-कानन महक उठा है, झूम रही पुरवाई है।

कवि देवेन्द्र श्रीवास्तव ‘देवेश’ ने मुख्य अतिथि के रूप में पढ़ा– भाषारस-गागरी के हम सर्जक का स्नेहिल परिवार। नाथ पृथ्वी के नेतृत्व में लेता है शुभ संकल्प यह आज।।

तलब जौनपुरी ने ग़ज़ल पेश की– हिन्दी हमारी आन-बान-शान की ज़बान है, इस मुल्क़ की बलन्दियों की भी यही पहचान है।

संचालक डॉ० प्रदीप चित्रांशी ने सुनाया– वतन के भाल पर शोभित हमारी शान हिन्दी है, हमारी सभ्यता की ये अमिट पहचान हिन्दी है।

समारोह-संयोजक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने प्रासंगिक दोहा सुनाया– भाषा रस ले गागरी चली पिया के देश। आगे-पीछे घिर गयी, तरह-तरह के वेश।

केशव सक्सेना ने पढ़ा– हिन्दी हमारी मातृभाषा हम सबको प्यारी है।

डॉ० रामलखन चौरसिया ने दोहा सुनाया, “देख कोलाहल कार के, हंस हो गये मौन। अन्धों के बाज़ार में, आँख ख़रीदे कौन।।”

आयोजन में ज्योति चित्रांशी की विशेष भूमिका रही।