“निराला की ‘राम की शक्तिपूजा’ एक मौलिक अवधारणा है”
‘सर्जनपीठ’, प्रयागराज की ओर से सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ की पुण्यतिथि के अवसर पर १५ अक्तूबर को ‘राम की शक्तिपूजा और निराला’ विषयक एक आन्तर्जालिक राष्ट्रीय बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन किया गया था।
शासकीय महाविद्यालय, हटा-दमोह (म० प्र०) की सहायक अध्यापक डॉ० आशा राठौर ने कहा, “छायावाद के आधारस्तंभ, कालजयी रचनाकार सूर्यकांत त्रिपाठी निराला द्वारा लिखित ‘राम की शक्तिपूजा’ एक ऐसी रचना है, जो समय के साथ-साथ और भी ज्यादा प्रासंगिक होती जा रही है; क्योंकि इस रचना में राम को एक ईश्वरीय अवतार के रूप में चित्रित न करते हुए, कई संदर्भों मे निरूपित किया गया है। एक सामान्य मानव किस तरह से चारों तरफ अन्याय को देखकर निराशा से घिरता है और फिर उससे कैसे बाहर निकलकर संघर्ष करता है तथा सत्य और न्याय के पक्ष में अंततः विजयश्री उसका वरण करती है, इसे निराला ने रेखांकित किया है।

आयोजक भाषाविज्ञानी एवं समीक्षक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने ‘राम की शक्तिपूजा’ की मौलिक अवधारणा प्रस्तुत करते हुए बताया “निराला की शक्ति की मौलिक कल्पना यह है कि मानव को न्याय के पक्ष मे होने मात्र से गर्व नहीं करना चाहिए; क्योंकि गर्व मानव-मन का असुर है। हमारे कर्म के मूल मे व्यक्तिगत उद्देश्यों का रहना भी एक प्रकार से गर्व का ही रूप है। यही कारण है कि राम को आराधना के लिए उर्ध्वगमन की यौगिक क्रिया भी करनी पड़ती है। ‘राम की शक्तिपूजा’ की शक्ति को दैवी आध्यात्मिक शक्ति के रूप मे देखना भूल होगी। निराला की शक्ति-विषयक मौलिक परिकल्पना शक्ति को नैतिक दृष्टिबोध से संवलित कर देती है, तभी निराला कहते हैं, “आराधन का दृढ़ आराधन से उत्तर दो। तुम वरो विजय संयत प्राणों से प्राणों पर।”
पुणे (महाराष्ट्र) की हिन्दी-विदुषी डॉ० नीलम जैन ने कहा, “राम की शक्तिपूजा’ मे उनकी जानकी मात्र प्रिया नहीं है, अपितु स्वतंत्रता की देवी है और वे उनकी मुक्ति का भरपूर प्रयास करते हैं। निराला ने कविता मे शक्ति को रूपक के माध्यम से स्वतंत्रता का चित्र अंकित किया है। जामवंत का परामर्श भी नितांत लौकिक एवं सामाजिक है। राम की शक्ति पूजा में निराला संदेश देते हैं कि युद्ध के लिए बाहरी शक्ति से अधिक अंदर की शक्ति आवश्यक है, जो विजय का कलाशारोहण करती है।”
हरदोई निवासी स्वतन्त्र पत्रकार राघवेन्द्र कुमार ‘राघव’ का मत है, “निराला ने राम की शक्तिपूजा के माध्यम से कविता को नयी ऊँचाई प्रदान की है। उनकी कविता राम को भगवान् मानकर नहीं अपितु अनवरत और अनिर्णीत युद्ध से परेशान एक योद्धा की गाथा है। निराला ने युद्धरत-पत्नीवियोगी राम के मनोवैज्ञानिक पक्ष को संतुलित ढंग से साधा है और एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है।”
बेसिक शिक्षा-विभाग, हरदोई मे सहायक अध्यापक आदित्य त्रिपाठी ने कहा, “कविता का कहन जब स्वतन्त्र होता है तभी उर्वर होता है। महाप्राण निराला जी भी कवि के रूप मे परम स्वतन्त्र रहे हैं। अपनी कालजयी रचना ‘राम की शक्तिपूजा’ मे पहली ओर, वे राम के मानवीय उदात्त चरित्र से परिचित कराते हैं तो दूसरी ओर, राम के द्वारा शक्तिपूजा के बहाने नारी-सत्ता की महत्ता को सिद्ध करते हैं।”