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शक्ति व्यंजना-लक्षणा, अभिधा करे कमाल
— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
एक–
भाषा ले रसगागरी, चली पिया के देश।
लिपि अगवानी में रही, मुग्ध रहा परिवेश।।
दो–
सौम्य कविता-कामिनी, ले रचना परिधान।
उपमा, अद्भुत, सोरठा, सबका है सम्मान।।
तीन–
आवश्यक आलोचना, रचना-रूप विधान।
जहाँ समस्या की उपज, होता वहाँ निदान।।
चार–
तुलसी राम बखानते, सूर कृष्ण के पास।
मीराँ श्याम निहारतीं, दृष्टि भरी है आस।।
पाँच–
छन्दविवेचन कर यहाँ, शब्द-शब्द अलगाय।
रससर्जन का स्रोत भी, अलंकार को पाय।।
छ: —
कहते अंग काव्य हैं, ठोक बजाकर ताल।
शक्ति व्यंजना-लक्षणा, अभिधा नोचे बाल।।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १३ अक्तूबर, २०२० ईसवी।)