★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
‘न्यू इण्डिया की मोदी-सरकार’ ने अपनी बेहद घटिया आर्थिक नीति को लागू कर, जनसामान्य की कमर तोड़ कर रख दी है; क्योंकि वह पिछले सात वर्षों से इस भ्रम को जीती आ रही है कि ‘नरेन्द्र मोदी’ का कोई विकल्प नहीं है। इसके कारण के मूल में ‘छद्म हिन्दुत्व’ का झण्डा लहरानेवाले वे अत्याचारी-अनाचारी-कदाचारी अवसरवादी लोग हैं, जो पापकर्म करते हुए, रुपये के पेड़ अपने घर-आँगन में उगाते आ रहे हैं और जिनके ख़ून में साम्प्रदायिकता घुल-मिल चुकी है। देश की औसत जनता इस सरकार की दिशाहीन नीतियों के क्रियान्वयन से त्रस्त हो चुकी है; लाखों लोग अपनी नौकरियाँ खो चुके हैं। विभिन्न कार्यालयों में रिक्तियाँ हैं; किन्तु हिन्दुत्व की अफ़ीम चटानेवाली मोदी-सरकार बेअसर और बेख़बर है। ‘कोरोना’ के दोनों काल में देश की जनता ‘प्राणवायु’ और आवश्यक सुई और दवाओं की माँग करते-करते त्रस्त और पस्त हो चुकी थी; लोग अपने मरे हुए सगे-सम्बन्धियों के चेहरे देखने के लिए तड़प कर रह गये थे; ‘कफ़न’ के लिए तरस गये थे। इतना सब होने के बाद भी जो व्यक्ति स्वयं को ‘देश की सरकार’ कहता है, उसने संवेदना के स्वर में आज तक एक शब्द नहीं कहा है। ऐसे में, इस सरकार को धूल चटाना अब अपरिहार्य हो चुका है।
पिछले सात वर्षों में देश की वास्तविक आर्थिक विकास की कितनी दुर्गति हुई है, इस पर तटस्थ रहकर अब विचार करने की आवश्यकता है। १ डॉलर का मूल्य अब लगभग ७४ रुपये पहुँच चुका है। देश की आयात-निर्यातनीति में कहीं-कोई सन्तुलन नहीं है; आर्थिक विकास-दर की गति अति शोचनीय स्थिति में आ चुकी है; शासकीय नियोजन के विषय में मोदी-सरकार “ख़ाली डिब्बा-ख़ाली बोतल” दिख रही है; नारी-सम्मान, देश का किसान, शिक्षित-अर्द्धशिक्षित बेरोज़गार, देश की सीमाएँ, “जायें तो जायें कहाँ” की स्थिति में जी रही हैं; किन्तु इन सभी सन्दर्भों में मोदी-सरकार और उसके मुख्यमन्त्रियों की खुली आँखें इन अनियमितताओं को देखकर भी देख नहीं पा रही हैं, जबकि स्वार्थ-सन्दर्भ में सबकी आँखें खुली हुई हैं। इन्हीं सब कारणों से इस सरकार और उसके अनुचरों-परिचरों के प्रति देश की जनता का विश्वास दम तोड़ रहा है। ५० वर्षों तक शासन करते रहने का मोह और लोभ इस कथित सरकार के आचरण की सभ्यता को कितना गिरा चुका है, अभी इसे इसका बोध नहीं हो पा रहा है; क्योंकि यह अहम्मन्यता का शिकार है।
इस सरकार ने अपने कुकर्त्तव्य के स्तर पर देश के मतदाताओं को, विशेषत: मध्यमवर्ग और आरक्षणरहित मतदाताओं को इतना कुछ दिखा-समझा दिया है कि अब देश के औसत मतदाताओं को देश की हर जगह से ‘भारतीय जनता पार्टी’ की क़ब्र खोदने के लिए ‘अमोघ कुल्हाड़ी’ की व्यवस्था कर लेनी होगी और दो ग़ज ज़मीन की भी; मणिकर्णिका घाट पर ‘बेहया की सूखी लकड़ियाँ’ सजाकर रख देनी होंगी, जिनपर जले हुए ‘मोबाइल ऑयल’ का छिड़काव भी कर देना होगा।
पिछले सात वर्षों से जनसामान्य तीव्र गति में नरेन्द्र मोदी की बन्द आँखों के परिणाम का भुगतान करता आ रहा है। ग़रीबी, महँगाई, हिन्दू-मुसलमान की राजनीति, रोडशो, आत्मप्रदर्शन, आत्मविज्ञापन, विदेशभ्रमण, स्थानों का अनौचित्यपूर्ण परिवर्त्तन, एक राष्ट्र-एक कर की छद्म नीति (जी०एस०टी०) नोटबन्दी, आधार कार्ड से निजता का हनन, देश के प्रमुख लोग की जासूसी कराना, ‘मोदी ऐण्ड कम्पनी’ की गर्हित नीतियों पर प्रश्न खड़े करने पर सम्बन्धित व्यक्ति को ‘राष्ट्रद्रोही’ घोषित कर उसे अनिश्चितकाल के लिए कारागार में डाल देना, लोकघाती बैंकिंग व्यवस्था, केन्द्रीय जनहित-योजनाओं आदिक की भूल-भुलय्या में नरेन्द्र मोदी कब तक देश की जनता को अपने भ्रमजाल में फँसाते रहेंगे? एक सामान्य से विशिष्ट व्यक्ति तक इनके शासनकाल में कितना असुरक्षित अनुभव कर रहा है, कभी जागरूक बनकर मोदी बाबू ने इसका संज्ञान लेने का प्रयास तक भी किया है?
निस्सन्देह, ‘नरेन्द्र मोदी ऐण्ड कम्पनी’ की प्राथमिकता है– हमारा साम्राज्य निष्कण्टक बना रहे, भले ही उसके लिए हमें किसी भी ‘गर्हित सीमा’ तक जाना पड़े।
कभी बन्द कक्ष में शान्तिपूर्वक बैठकर नरेन्द्र मोदी ने इस विषय पर आत्मपरीक्षण किया है— मैं कितना प्रपंची-पाखण्डी और बेहद झूठा प्रधानमन्त्री हूँ, जिसने पूरी तरह से आँखें खोलकर भोली-भाली जनता को एक नहीं, बल्कि ‘सैकड़ों’ की संख्या में, मुक्त जनसभाओं में मोहक आश्वासन दिये थे तथा बाँहें भाँजकर और छप्पन इंच सीना में कार्बन-हाइड्रोक्लोरिक गैस भरकर उछाल मारते हुए, वीर और रौद्ररस में लोकमंगलकारी घोषणाएँ की थीं, जो बदबूदार “बीरबल की खिचड़ी” को चरितार्थ कर रही हैं।
आरक्षण, प्रतिआरक्षण, पिछड़े-अति पिछड़े-वर्ग की बेहद घिनौनी राजनीति कर, अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति अधिनियम’ की “डंके की चोट पर” व्यवस्था कराकर जिस ‘सामाजिक समरसता’ में विष घोलकर इस अवसरवादी सरकार ने हमारे सौमनस्य के साथ बलप्रयोग करते हुए, सार्वजनिक वैमनस्य का वातावरण बनाया/बनवाया है, वह ‘भारत के राजनैतिक इतिहास’ में ‘कालिमामय अपूर्व अध्याय’ के रूप में ‘बेचैन अपराधी’ की तरह से फड़फड़ाता रहेगा।
मत भूलिए नरेन्द्र मोदी! आप कोई भाग्यविधाता नहीं हैं; आप भी उन्हीं याचकों में से एक हैं, जो निर्वाचन के समय घुटनों के बल रेंगते हुए, असहाय की भाँति उन्हीं लोग तक पहुँचते हैं, जिनकी भावनाओं-संवेदनाओं के साथ आप अब तक क्रूर छल-कपट करते आ रहे हैं।
आज देश का निम्न और मध्यम-वर्ग मोदी-सरकार के शासनकाल में कितना त्रस्त है, इसे मोदी की शुष्क संवेदना समझ नहीं सकती। अहंकारियो! आसाराम, राम रहीम आदिक के पाप के घड़े कब और कैसे भर गये और उसका परिणाम और प्रभाव कितने व्यापक रूप में प्रकट हो गया, उसे किसी ने भी सोचा नहीं था। राजनैतिक माफ़ियाओं के भी पाप का घड़ा भरता है। समय की प्रतीक्षा है।
‘नरेन्द्र मोदी ऐण्ड कम्पनी’ को यह नहीं भूलना चाहिए कि देश के मतदाता अपने राष्ट्र के प्रति समर्पित हैं। वे भारतीय जनता पार्टी के ‘लव जिहाद’, ‘मन्दिर-मस्जिद’, ‘हिन्दू-मुसलमान की राजनीति’, ‘महँगाई-पर-महँगाई’ ‘निरंकुश नीतियों’, बीभत्स (‘वीभत्स’ अशुद्ध शब्द है।) कारनामों तथा देश के विपक्षी दलों पर बेहाथ-पैर के आरोपों की सच्चाई को हमारे मतदाता अब अच्छी तरह से समझने की स्थिति में आ चुके हैं।
मत भूलो तानाशाहो! आनेवाले चुनावों में मतदाताओं के प्रतिकार-प्रतिशोध की क्रान्तिकारिक अनुगूँज संसद् की दीवारों में दरार पैदा कर देगी और असहाय-निस्सहाय बनाकर एक ऐसी फ़क़ीरी के गह्वर में धकेलेगी (‘ढकेलेगी’ अशुद्ध शब्द है।), जहाँ से अवशेष पाना भी असम्भव हो जायेगा।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १ सितम्बर, २०२१ ईसवी।)