मनीष कुमार शुक्ल ‘मन’, लखनऊ-
जान मेरी छोड़ मुझको अगर जाएगी |
ज़िन्दगी टूट कर के बिखर जाएगी ||
इन गुलाबों से ख़ुद को सजा लीजिए |
कुछ तो इनकी भी लाली निखर जाएगी ||
रंग अपनी अदा के बिखर जाने दो |
तितलियों को ये रंगत अखर जाएगी ||
मैं भँवरे सा तुम पर मचल जो गया |
तुमको उनकी भी लग ही नज़र जाएगी ||
मेरी बाहों में सुलझेगी सँवरेगी जब |
जाँ मेरी रूठ कर फिर किधर जाएगी ||
दिल की दहलीज़ को रखना रौशन है ‘मन’ |
जाँ मेरी आएगी और ठहर जाएगी ||