इसे कहते हैं, ‘बलिदान और बलिदानी’

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

“दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे
आज़ाद ही रहेंगे, आज़ाद ही मरेंगे।”

इसे अक्षरश: सच कर दिखाया था, रण-बाँकुरे चन्द्रशेखर आज़ाद ने। वही चन्द्रशेखर आज़ाद, जिनके गुप्त प्रवास की सूचना पराधीन भारत के कतिपय विश्वासघाती हिन्दुस्तानियों ने अँगरेज़ों को दे दी थी; फलस्वरूप आज ही की तिथि (२७ फ़रवरी, १९३१ ई०) में ‘अल्फ्रेड पार्क’, इलाहाबाद में अँगरेज़ों ने उनकी घेराबन्दी कर ली थी; उनका सुरक्षित निकल पाना, सम्भव नहीं दिख रहा था। साहसपूर्वक अँगरेज़ी सैनिकों का सामना करने के बाद जब उनकी पिस्टल में मात्र एक गोली रह गयी थी तब उन्होंने स्वयं को देश की आन पर बलिदान कर दिया था। उस हुतात्मा को हम समस्त स्वतन्त्र भारतवासियों का नमन है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २७ फ़रवरी, २०२१ ईसवी।)