मुझे लगता है कि अमेरिका आज के दिन तक तो कामयाब है। यूक्रेन बलि का बकरा बन गया है या कहें ज़ेलेंस्की मोहरे बन गए हैं। अमेरिका पिछले कुछ वर्षों से रूस को लेकर कुछ ज़्यादा ही बेचैन रहने लगा था, क्योंकि रूस अपना खोया रुतबा दुबारा हासिल करने के लिए बेचैन था। दुर्भाग्य से मीडिया या सोशल मीडिया पश्चिम प्रेरित या नियन्त्रित है और इस नाते इस समय ज़्यादातर ख़बरें भी युद्ध के पूरे परिदृश्य को दिखाने के बजाय एक तरफ़ झुकी हुई हैं। रूस का पक्ष लगभग ग़ायब है। फेसबुक पर वैसी तमाम पोस्टें हटाई गई हैं या हटाई जा रही हैं, जो रूस का पक्ष मज़बूत करने वाली हो सकती हैं। सवाल है कि दोनों तरफ़ की खबरें समान रूप से क्यों नहीं सामने आनी चाहिए? पश्चिम के देशों में रूसी मीडिया से निकलती ख़बरों और रूस के पक्ष को लोगों तक पहुँचने से रोक दिया गया है। गूगल, फेसबुक, यूट्यूब, ट्विटर वग़ैरह पश्चिम के नियन्त्रण में हैं, तो जाहिर है भारत के मीडिया को भी नब्बे प्रतिशत सूचनाएँ पश्चिमी मीडिया के ज़रिये ही मिल रही हैं। सोचिए कि रूस यूक्रेन में अपना दूतावास बन्द करता है हफ़्ता भर पहले, पर पश्चिमी मीडिया इसकी ख़बर चलाता है एक ख़ास समय पर आज। गूगल ने रूस के विरोध में लोकेशन बताने वाली अपनी कुछ सेवाएँ यूक्रेन में बन्द कर दी हैं, क्योंकि इसका फ़ायदा रूस को मिल सकता है। असल में यह मिलिट्री-युद्ध से कहीं ज़्यादा सूचना-युद्ध है। अमेरिका इस सूचना-युद्ध में बाज़ी मार रहा है। एकतरफ़ा सूचनाओं का ही असर है कि दुनिया के तमाम देशों को लगने लगा है कि रूस यूक्रेन में आम लोगों को बड़े पैमाने पर मार रहा है, जबकि वहाँ मौजूद भारत के ही पत्रकार राजेश बता रहे हैं कि यह सच नहीं है, बल्कि रूस की भरसक कोशिश है कि आम नागरिक युद्ध की चपेट में न आएँ, हालाँकि जैसे-जैसे समय गुज़रेगा, आम लोग भी चपेट में आएँगे ही। अमेरिका की कोशिश है कि बड़ी सङ्ख्या में आम नागरिक मारे जाएँ। उसे इससे कोई मतलब नहीं है कि यूक्रेन बचे या पूरी तरह समाप्त हो जाए, उसका मक़सद बस यह है कि रूस को पूरी तरह खलनायक साबित कर दिया जाए।
अमेरिका शातिराना तरीक़े से युद्ध को और लम्बा करवाना चाहता है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने इस बात पर प्रसन्नता जताई ही है कि बिखर रहे नाटो देश फिर से एकजुट नज़र आ रहे हैं। अमेरिका चाहता है कि दुनिया के देश उसके पक्ष में एकजुट हों और रूस पर हर तरफ़ से प्रतिबन्धों की मज़बूत बाड़ लगा दी जाए, ताकि वह सीना तानकर चलने लायक न रहे। उसका आकलन यही है कि युद्ध लम्बा खिंचेगा तो आम नागरिक भी ज़्यादा सङ्ख्या में मारे जाएँगे और तब रूस के ख़िलाफ़ वैश्विक स्तर पर नफ़रत का भाव जगाना और बढ़ाना और आसान हो जाएगा। यूक्रेन के प्रति सहानुभूति और सहायता बस एक नाटक है। यूक्रेन को बचाने की ही चिन्ता होती तो अमेरिका को यह कहने में क्या परेशानी थी कि हम अभी यूक्रेन को नाटो का सदस्य नहीं बनाएँगे या कि रूस को घेरने का हमारा कोई मक़सद नहीं है। यूक्रेन को बचाना नहीं, बल्कि रूस को कमज़ोर करना अमेरिका लक्ष्य है।
नाटो, यानी रूस विरोधी देशों का समूह। जब नाटो बनाया ही गया था रूस के ख़िलाफ़, तो ऐसे में सोचा जा सकता है कि रूस आख़िर क्यों नाटों की सेनाओं को अपने दरवाज़े पर जमा होने देना चाहेगा? यह भी ध्यान देने लायक़ है कि नाटो का नाटक यूक्रेन में अमेरिका कई साल से खेल रहा है और बीते साल के आख़िरी में जब यह ख़तरा ज़्यादा ही बड़ा बनने लगा, तब कहीं रूस ने आक्रमण का यह ऐलान किया। सामान्य रूप से ऐसा लगता है कि यूक्रेन निरीह है और बेवजह रूस ने बिना किसी उकसावे के उस पर हमला कर दिया है, पर विश्व राजनीति को देखने-समझने वाले जानते हैं कि वास्तविकता ऐसी नहीं है। लगातार दिख रहा है कि अमेरिका नाटो का विस्तार करते-करते रूस के काफ़ी नज़दीक पहुँच चुका है, बस यूक्रेन को ही अपनी ज़द में लेना बाक़ी रह गया था। कोई भी हो, ख़ुद को चारों तरफ़ से घिरता देखकर जैसा कदम उठाने की सोचेगा, वैसा ही रूस ने उठाने की कोशिश की है।
मुश्किल यह है कि ज़ेलेंस्की की छवि अपने देश में बहुत अच्छी न होते हुए भी सूचना-तन्त्र के सहयोग से वे अपने लोगों में भावनात्मक उभार लाने में कामयाब हो रहे हैं और नतीजा यह हो रहा है कि आम लोग भी अब हाथ में हथियार उठाकर रूसी सेना के सामने खड़े होने लगे हैं। सहानुभूति बटोरने का खेल अद्भुत तरीक़े से खेला जा रहा है। कल ‘यूनाइटेड नेशंस’ को सम्बोधित करते हुए ज़ेलेंस्की ने भावुक होकर कहा कि रूस ने फ्रीडम ऑफ़ यूक्रेनिया पर क्रूज मिसाइल दागी है, जबकि यह सच नहीं था, क्योंकि जब उनका भाषण चल रहा था तो ठीक उसी समय ‘आजतक’ चैनल के रिपोर्टर राजेश वहाँ मौजूद थे। उन्होंने कैमरा पीछे मोड़कर दिखाया कि फ्रीडम ऑफ़ यूक्रेनिया पर कहीं कोई मिसाइल नहीं दागी गई थी। बहरहाल, ज़ेलेंस्की का भाषण ख़त्म होने के थोड़ी देर बाद रूस ने प्रतिक्रिया में यूक्रेन में टीवी मीडिया को ठप करने के लिए टीवी टॉवर को ध्वस्त कर दिया।
रूस और यूक्रेन के बीच होने जा रही आज रात की बातचीत से तय होगा कि अगले कुछ दिन कैसे बीतने वाले हैं। यूक्रेन काफ़ी कुछ तबाह हो चुका है; रूस की अर्थव्यवस्था पर ख़तरे हैं; पर अमेरिका युद्ध रोकने की कवायद के पीछे अट्टहास कर रहा है। उसे तमाम देशों से हथियारों के बड़े-बड़े ऑर्डर मिलने लगे हैं।
हम भारतीयों के लिए सुकून की बात बस इतनी है कि हमारे नेताओं में संवेदना के तत्त्व अभी बाक़ी हैं और यूक्रेन में फँसे भारतीय छात्रों को बचाने की मुहिम चलाई जा रही है। तमाम दूसरे देशों ने अपने नागरिकों या छात्रों को बचाने के लिए ऐसी कोई मुहिम नहीं चलाई है और उन्होंने यूक्रेन में फँसे अपने लोगों को भाग्य भरोसे छोड़ दिया है। बहरहाल, इस पूरे युद्ध का भारत के लिए एक ही सबक़ हो सकता है कि जैसे भी हो, हमें हर हाल में अतिशय शक्तिशाली बनना होगा। बिना शक्ति हासिल किए शान्ति का हमारा सन्देश अनसुना कर दिया जाएगा।

साभार– प्रख्यात साहित्यिक पत्रकार सन्त समीर जी की फेसबुक वॉल से