और मेरा सत्य राम हैं

सुमन्त्र मौन थे। वन की निस्तब्धता और भी गहन होती जा रही थी। वृक्षों की छाया मानो स्वयं इस संवाद को सुनने के लिए ठहर गई थी। मंद पवन बह रही थी, किन्तु उसके भीतर भी एक करुण कम्पन था। ऐसा प्रतीत होता था कि सम्पूर्ण प्रकृति सीता के हृदय की धड़कनों को सुन रही है।

सीता ने पुनः धीरे-धीरे बोलना आरम्भ किया।

“हे तात! लोग समझते हैं कि मैं वन में अपने पति के पीछे-पीछे चली आई हूँ, परन्तु यह केवल बाहरी दृष्टि है। वस्तुतः मैं कहीं आई ही नहीं हूँ। जहाँ राम हैं, वहीं मेरा आरम्भ है और वहीं मेरा अन्त है। एक स्त्री का जीवन किसी भवन, किसी राज्य अथवा किसी ऐश्वर्य में नहीं बसता, उसका जीवन उसके सत्य में बसता है। और मेरा सत्य राम हैं।”

कुछ क्षणों तक उन्होंने दूर क्षितिज की ओर देखा।

“तात! संसार का सबसे बड़ा दुःख वियोग नहीं, अपितु अपने सत्य से अलग हो जाना है। जो अपने सत्य से कट जाता है, वह राजमहलों में रहकर भी अनाथ हो जाता है। और जो अपने सत्य के साथ रहता है, वह वन में रहकर भी परम समृद्ध हो जाता है।”

उनकी आँखें सजल थीं।

“लोग सोचते हैं कि मैंने राजसुख छोड़ दिया। किन्तु मैं पूछती हूँ कि क्या कभी किसी ने प्रेम को सुख के तराजू पर तौला है? यदि प्रेम सुविधा से संचालित हो तो वह व्यापार है, प्रेम नहीं। यदि साथ केवल अनुकूलता तक सीमित हो तो वह अनुबंध है, समर्पण नहीं। समर्पण वहाँ आरम्भ होता है जहाँ मनुष्य अपने सुख-दुःख के गणित को छोड़ देता है।”

उन्होंने भूमि पर पड़े सूखे पत्ते को उठाया।

“देखिए तात! यह पत्ता जब तक वृक्ष से जुड़ा था, तब तक हरा था। उसमें रस था, जीवन था। जैसे ही उसका सम्बन्ध टूट गया, उसका अस्तित्व समाप्त होने लगा। मनुष्य भी ऐसा ही है। उसका सम्बन्ध जब अपने धर्म से टूटता है, तब उसके भीतर धीरे-धीरे शुष्कता भरने लगती है।”

सुमन्त्र ने धीरे से कहा—

“पुत्री! तुम्हारी बातें मनुष्य को विचलित कर देती हैं। तुम्हारी आयु इतनी नहीं जितनी तुम्हारी बुद्धि है।”

सीता ने मन्द मुस्कान से उत्तर दिया—

“तात! बुद्धि आयु से नहीं आती, प्रेम से आती है। जो जितना प्रेम करता है, वह उतना ही परिपक्व हो जाता है। प्रेम मनुष्य को भीतर से वृद्ध बना देता है और आत्मा को विशाल कर देता है।”

फिर वह एक क्षण के लिए मौन हो गईं।

“किन्तु तात! प्रेम का सबसे बड़ा दण्ड भी प्रेम ही है।”

सुमन्त्र ने विस्मित होकर पूछा—

“वह कैसे पुत्री?”

सीता बोलीं—

“क्योंकि प्रेमी व्यक्ति कभी स्वयं के लिए नहीं जी पाता। उसका सुख दूसरे में बस जाता है। उसकी श्वास दूसरे की शान्ति पर निर्भर हो जाती है। वह स्वयं को भूलने लगता है। यह विस्मरण ही प्रेम की सर्वोच्च अवस्था है।”

उनकी आँखों से अश्रु टपकने लगे।

“तात! क्या आप जानते हैं कि वियोग क्या होता है?”

“नहीं पुत्री, तुम बताओ।”

“वियोग केवल दूरी का नाम नहीं है। वियोग वह है जहाँ व्यक्ति सामने हो और आत्माएँ दूर हो जाएँ। और संयोग वह है जहाँ शरीर दूर हों किन्तु आत्माएँ एक हो जाएँ। मैं राम से कभी अलग नहीं हो सकती क्योंकि मेरा अस्तित्व ही उनका विस्तार है।”

उन्होंने आगे कहा—

“मनुष्य का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि वह स्वयं को स्वतंत्र सत्ता मान बैठता है। यही अहंकार दुःख का कारण है। जब तक ‘मैं’ जीवित है, तब तक पीड़ा जीवित है। जहाँ ‘हम’ का जन्म होता है, वहाँ पीड़ा समाप्त होने लगती है।”

वन की ओर संकेत करते हुए वह बोलीं—

“देखिए तात! ये वृक्ष अकेले खड़े नहीं हैं। ये एक-दूसरे की जड़ों से जुड़े हैं। यही जीवन का रहस्य है। सम्बन्ध स्वामित्व नहीं, सह-अस्तित्व है।”

कुछ दूर राम और लक्ष्मण दिखाई दे रहे थे।

सीता उन्हें देखती हुई बोलीं—

“लोग राम को राजा कहते हैं। कोई उन्हें अवतार कहता है। कोई उन्हें मर्यादा कहता है। परन्तु मेरे लिए राम इनमें से कुछ भी नहीं हैं। मेरे लिए राम मेरे प्राणों का मौन संगीत हैं। मैं उन्हें किसी पद से नहीं पहचानती। मैं उन्हें अपनी श्वासों में पहचानती हूँ।”

सुमन्त्र के नेत्र पुनः भर आए।

सीता ने धीरे से कहा—

“तात! एक दिन ऐसा आएगा जब लोग मेरे त्याग की चर्चा करेंगे। कोई मुझे आदर्श स्त्री कहेगा, कोई पतिव्रता कहेगा, कोई तपस्विनी कहेगा। किन्तु मैं चाहती हूँ कि वे मेरे त्याग को न देखें। त्याग को देखने वाला प्रेम को कभी नहीं समझ सकता।”

“तो क्या देखें, पुत्री?”

“वे यह देखें कि प्रेम किसी को छोटा नहीं करता। प्रेम मनुष्य को ब्रह्माण्ड जितना विशाल बना देता है।”

फिर उन्होंने एक अत्यन्त गम्भीर स्वर में कहा—

“आज मैं वन में जा रही हूँ। कल जीवन मुझे किसी और अग्निपरीक्षा में डालेगा। परन्तु मनुष्य को परिस्थितियों से नहीं, अपने भीतर की स्थिरता से पहचाना जाता है।”

“धर्म क्या है तात?”

सुमन्त्र चुप रहे।

सीता स्वयं उत्तर देने लगीं—

“धर्म नियमों का संग्रह नहीं है। धर्म वह है जो परिस्थितियाँ बदल जाने पर भी नहीं बदलता। यदि सुविधा बदलते ही हमारा आचरण बदल जाए तो वह धर्म नहीं, स्वार्थ है।”

“और प्रेम?”

“प्रेम वह है जिसमें अधिकार समाप्त हो जाता है।”

“और समर्पण?”

“समर्पण वह है जहाँ प्रश्न समाप्त हो जाते हैं।”

“और वियोग?”

“वियोग वह है जहाँ स्मृति ही प्राण बन जाती है।”

यह कहकर सीता की वाणी भर्रा गई।

“तात! अयोध्या लौटकर माता कौशल्या से कहना कि उनकी पुत्रवधू सुखी है। उनसे यह मत कहना कि वह रोई थी। माता सुमित्रा से कहना कि उनका त्याग संसार के लिए आदर्श बनेगा। माता कैकेयी से भी कहना कि मैं उनके प्रति कोई द्वेष नहीं रखती।”

सुमन्त्र चौंक पड़े।

“पुत्री! जिनके कारण यह सब हुआ, उनके प्रति भी नहीं?”

सीता ने शांत स्वर में कहा—

“द्वेष केवल उस मन में जन्म लेता है जो स्वयं को पीड़ित मानता है। मैं स्वयं को पीड़ित नहीं मानती। जो कुछ हुआ, वह धर्म की किसी बड़ी योजना का भाग है।”

“क्या तुम्हें क्रोध नहीं आता?”

“नहीं तात।”

“क्यों?”

“क्योंकि क्रोध तब आता है जब हम सोचते हैं कि संसार हमारे अनुसार चलना चाहिए। मैंने संसार को स्वीकार करना सीख लिया है।”

फिर उन्होंने अत्यन्त करुण स्वर में कहा—

“तात! मनुष्य के जीवन में दो ही यात्राएँ होती हैं। पहली बाहर की यात्रा और दूसरी भीतर की यात्रा। अधिकांश लोग बाहर की यात्रा पूरी कर लेते हैं, पर भीतर की यात्रा कभी आरम्भ नहीं कर पाते। वनवास वस्तुतः भीतर की यात्रा का आरम्भ है।”

धीरे-धीरे सूर्य अस्ताचल की ओर बढ़ने लगा।

सीता ने अन्तिम बार कहा—

“आज से मेरा महल यह वन है, मेरी छत यह आकाश है, मेरा संगीत यह पवन है और मेरा वैभव राम का सान्निध्य है। यदि यह सब होते हुए भी मैं स्वयं को दुःखी मानूँ तो यह प्रेम का अपमान होगा।”

और इतना कहकर वह मौन हो गईं।

किन्तु उनका मौन भी बोल रहा था।

सुमन्त्र रो रहे थे।

वन रो रहा था।

समय रो रहा था।

और इतिहास अपने सबसे उज्ज्वल चरित्र को निहार रहा था।