शैक्षणिक संस्था ‘हिन्दी-संसार’ के सभागार मे देश के अनेक हिस्सोँ से आये शताधिक हिन्दी-साहित्य के विद्यार्थियोँ का नगर और बाहर के शिक्षाविदोँ और भाषाविज्ञानी ने उनका समुचित मार्गदर्शन किया। पाँच दिनो तक चलनेवाले समारोह के पहले दिन उद्घाटन किया गया।
वाराणसी से पधारे प्रो० बलराज पाण्डेय ने मुख्य अतिथि के रूप मे कविता पर व्याख्यान करते हुए बताया– कविता-संस्कृत-काल से फैली हुई है। कवि कम पंक्तियोँ मे विश्व की समस्त सृष्टि को व्याख्यायित करने की क्षमतारखता है। दूसरोँ के दु:ख को देखकर जब उसकी अनुभूति होती है तब वह करुणा का सर्जन करता है।
अध्यक्षता कर रहे व्याकरणवेत्ता एवं भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने वक्ताओँ को विषय समेटते हुए आलोचना के अर्थ-अवधारणा सुस्पष्ट करते हुए, निबन्ध-विषय की व्याख्या की। उन्होँने शब्दानुशासन के अन्तर्गत कहा– विद्यार्थियोँ को सर्वप्रथम अपने-अपने उच्चारण और लेखन के प्रति सतर्क रहना पड़ेगा; क्योँकि उनसे उनकी योग्यता और पात्रता का मूल्यांकन हो जाता है। आचार्य ने हल्-चिह्न, विरामचिह्न समध्वनिमूलक शब्दोँ के भिन्न-भिन्न अर्थोँ को समझाते हुए, व्याकरण के अंग-उपांगोँ पर प्रकाश डाला।
विशिष्ट अतिथि प्रो० मुश्ताक अली ने कहा– निबन्ध की दृष्टि से भारतेन्दु-मण्डल का विशिष्ट महत्त्व रहा है। उन्होँने अपने कथन की पुष्टि करते हुए, प्रेमघन, बालकृष्ण भट्ट, प्रतापनारायण मिश्र इत्यादिक की निबन्ध-शैली से सोदाहरण अवगत कराया।
विशिष्ट अतिथि प्रो० शशिकला त्रिपाठी ने आलोचना विषय पर कहा– आलोचक जिसको चाहता है, बहुत ऊपर उठाता है और जिसे चाहता है, ध्वस्त कर देता है। आलोचना करते समय बड़े-बड़े शब्दोँ के स्थान पर सरल शब्दोँ का व्यवहार करना चाहिए। समारोह का संयोजन डॉ० अशोक स्वामी ने किया।