अयोध्या की पुत्रवधू “धर्म की जननी”

संध्या उतर रही थी। सूर्य धीरे-धीरे पश्चिम के पर्वतों के पीछे विलीन हो रहा था। आकाश में लालिमा थी, पर वह लालिमा भी जैसे विरह का रंग धारण कर चुकी थी। वन की नीरवता में दूर-दूर तक पक्षियों के लौटने का कलरव सुनाई दे रहा था। प्रत्येक पक्षी अपने घोंसले की ओर लौट रहा था, किन्तु अयोध्या का राजमहल अपनी पुत्रवधू से रिक्त हो रहा था।

सुमन्त्र बार-बार पीछे मुड़कर सीता को देखते। उन्हें लगता था कि यह कोमलांगिनी राजकुमारी अधिक दूर तक नहीं चल सकेगी। किन्तु आश्चर्य यह था कि सबसे स्थिर कदम यदि किसी के थे, तो वे सीता के थे।

राम आगे थे। लक्ष्मण उनके पीछे और सबसे पीछे चलती हुई भी सीता किसी का अनुसरण करती हुई नहीं प्रतीत होती थीं। ऐसा लगता था मानो स्वयं पृथ्वी अपने पग बढ़ा रही हो।

कुछ दूर चलने के बाद सीता अचानक रुक गईं। उन्होंने भूमि पर अपना हाथ रखा। फिर अपनी आँखें बंद कर लीं।

राम ने मुस्कुराकर पूछा— “जानकी! क्या देख रही हो?”

सीता ने धीरे से कहा— “देख नहीं रही प्रभु… सुन रही हूँ।”

सुमन्त्र चकित हो उठे।

“धरती बोलती है?”

सीता ने अत्यन्त शान्त स्वर में कहा— “तात! धरती सदैव बोलती है। मनुष्य ही अपने शोर में उसकी आवाज़ खो देता है। जिस दिन मन का कोलाहल समाप्त हो जाता है, उसी दिन पृथ्वी बोलने लगती है।”

उन्होंने मिट्टी को अपनी हथेली में लेकर कहा— “यह मिट्टी अभी शीतल नहीं है। इसमें दिनभर की ऊष्मा शेष है। किन्तु इसके भीतर नमी बढ़ रही है। दो दिन के भीतर वर्षा होगी।”

सुमन्त्र ने आकाश की ओर देखा। न एक बादल। न वायु में आर्द्रता।

उन्होंने विनम्रता से पूछा— “देवि! बिना बादलों के वर्षा का अनुमान?”

सीता मुस्कुरायीं और कहा “बादल तो आकाश में दिखाई देते हैं तात! किन्तु उनका जन्म पृथ्वी के गर्भ में होता है। वृक्ष पहले जान जाते हैं। चींटियाँ पहले जान जाती हैं। जलचर पहले जान जाते हैं।

मनुष्य सबसे बाद में जानता है, क्योंकि वह प्रकृति को पढ़ने के स्थान पर केवल अपने लाभ की गणना करता रहता है।” इतना कहकर उन्होंने सामने चलते हुए चींटियों के समूह की ओर संकेत किया।

सैकड़ों चींटियाँ अपने अंडों को लेकर ऊँचे टीले की ओर जा रही थीं।

“देखिए। ये अपना घर बदल रही हैं। ये वर्षा का स्वागत कर रही हैं।”

राम ने लक्ष्मण की ओर देखा।

“स्मरण रखना लक्ष्मण।

जो राजा अपनी भूमि के छोटे जीवों को नहीं समझता, वह अपनी प्रजा के बड़े दुःख भी नहीं समझ सकता।”

लक्ष्मण ने श्रद्धा से मस्तक झुका दिया।


चलते-चलते वे एक विशाल वटवृक्ष के नीचे पहुँचे। सीता ने उसके तने को स्पर्श किया। उनकी आँखों में वात्सल्य उतर आया।

“प्रभु! यह वृक्ष कम से कम चार सौ वर्ष पुराना है।”

सुमन्त्र विस्मित थे।

“देवि! आपको यह कैसे ज्ञात हुआ?”

सीता ने वृक्ष की जटाओं की ओर संकेत किया।

इसकी जटाओं की संख्या देखिए। तने की परतें देखिए। शाखाओं का फैलाव देखिए। यह वृक्ष अनेक पीढ़ियों का इतिहास जानता है।

मनुष्य अपने वंश की तीन पीढ़ियाँ भी नहीं याद रख पाता, किन्तु यह वृक्ष चार सौ वर्ष से यहाँ खड़ा है।

कितने ऋषि आए होंगे। कितने राजा गुजरे होंगे। कितनी वर्षाएँ आई होंगी। कितने युद्ध हुए होंगे। किन्तु यह किसी का पक्ष नहीं लेता।

यही धर्म है।”

राम ने पूछा— “कैसा धर्म?”

सीता ने उत्तर दिया— एक वृक्ष जब सबको समान छाया देता है, यही उसका धर्म है। वह फल देकर भी ऋण नहीं जताता है, यही उसका धर्म है। वह पत्थर खाने पर भी फल लौटाता है, यही धर्म है।

सुमन्त्र की आँखें भर आईं। उन्हें लगा कि जनक ने केवल पुत्री नहीं पाली थी; उन्होंने स्वयं दर्शन को जन्म दिया था।


इसी समय वन में बैठे पक्षियों का स्वर अचानक बदल गया। अभी तक मधुर कलरव था। अब तीखी चेतावनी सुनाई देने लगी।

सीता ने तत्काल राम का हाथ रोक लिया।

“प्रभु! एक क्षण रुकिए।”

लक्ष्मण ने धनुष उठा लिया।

“क्या हुआ?”

सीता ने वृक्षों के शीर्ष की ओर देखा।

“वानर ऊपर चढ़ रहे हैं। हरिण उत्तर दिशा में भाग रहे हैं। मोर नाच नहीं रहे। सियारों का स्वर भी नहीं है। वन अभी किसी बड़े भय को देख रहा है।”

कुछ क्षण बाद दूर से हाथियों का विशाल झुंड निकल आया।

राम मुस्कुराए और बोले सीते! तुम्हारी दृष्टि वास्तव में अद्भुत है।

सीता ने धीरे से कहा— यह मेरी दृष्टि नहीं है। यह पृथ्वी की चेतावनी है; जो उसके संकेत समझ ले, वह संकट आने से पहले तैयार हो जाता है और जो नहीं समझता, वह भाग्य को दोष देता है।”


सुमन्त्र अब तक अनेक बार अश्रु पोंछ चुके थे।

उन्होंने कहा— देवि! राजमहल में आपका यह स्वरूप कभी दिखायी नहीं दिया।”

सीता ने गंभीर होकर उत्तर दिया— राजमहल मनुष्य को बाहर से बड़ा बना देता है। वन भीतर से। महल में मनुष्य दूसरों पर शासन करना सीखता है। वन में स्वयं पर और जो स्वयं पर शासन नहीं कर सकता, वह संसार पर शासन करने योग्य नहीं होता।

राम ने कहा— तात! यही कारण है कि हमारे ऋषियों ने राजकुमारों को वन भेजा। वन मे शिक्षा है और महल मे परीक्षा है। जिसने वन नहीं देखा, उसका राज्य अधूरा है।”


कुछ दूर आगे एक घायल मृग पड़ा था। उसके पैर में काँटा धँसा था। सीता तुरंत उसके पास बैठ गईं। उन्होंने अपने वस्त्र का एक अंश फाड़ा। काँटा निकाला। घाव को वनौषधि से बाँधा।

लक्ष्मण ने पूछा— भाभी! आपको औषधियों का भी ज्ञान है?”

सीता ने मुस्कुराकर कहा— भूमि केवल अन्न नहीं उगाती लक्ष्मण! वह औषधियाँ भी उगाती है। मनुष्य पहले प्रकृति का विद्यार्थी था। अब वह भौतिकता का दास बन गया है।

उन्होंने एक छोटी-सी पत्ती तोड़ी और कहा “यह रक्त रोकती है। यह ज्वर हरती है। यह विष को शांत करती है। यह घाव भरती है।” वन में प्रत्येक पत्ती एक वैद्य है। किन्तु मनुष्य उन्हें खरपतवार समझकर काट देता है।


सुमन्त्र के मन में प्रश्न उठा— देवि! यदि आपको प्रकृति से इतना प्रेम है, तो क्या कभी वन छोड़कर अयोध्या लौटने की इच्छा नहीं होगी?

सीता ने दूर क्षितिज की ओर देखा। फिर बोलीं— तात! जहाँ राम हैं, वहीं अयोध्या है। जहाँ धर्म है, वहीं राज्य है। जहाँ प्रेम है, वहीं वैकुण्ठ है और जहाँ कर्तव्य नहीं, वहाँ स्वर्ण का महल भी श्मशान से अधिक नहीं।”

कुछ क्षण मौन रहा। फिर उन्होंने एक वाक्य कहा, जिसने सुमन्त्र के अन्तर्मन को झकझोर दिया—

“मनुष्य घरों में नहीं रहता तात… वह अपने सत्य में रहता है। जिस दिन सत्य छूट जाता है, उसी दिन सबसे बड़ा महल भी निर्वासन बन जाता है।”

सुमन्त्र अब स्वयं को रोक न सके। उन्होंने झुककर सीता के चरण स्पर्श किए। उनकी वाणी भर्रा गई— वह बोले “देवि! आज मैं आपको अयोध्या की पुत्रवधू नहीं, स्वयं धर्म की जननी के रूप में देख रहा हूँ।”

सीता ने तुरंत उन्हें उठाया और कहा “नहीं तात।” मैं केवल एक साधारण स्त्री हूँ। यदि मेरे जीवन में कुछ भी श्रेष्ठ है, तो वह राम के चरणों का अनुसरण है। चन्द्रमा स्वयं प्रकाशवान नहीं होता। वह सूर्य का प्रकाश धारण करता है। यदि मेरे भीतर कोई तेज दिखाई देता है, तो वह भी मेरे आराध्य के धर्म का ही प्रतिबिम्ब है।

वन की वायु स्थिर हो गई। ऐसा प्रतीत होता था मानो वृक्ष भी इस संवाद को सुन रहे हों और सुमन्त्र ने पहली बार अनुभव किया कि इतिहास कभी-कभी शब्दों से नहीं, मौन से लिखा जाता है। जनकनन्दिनी के इस मौन में ही आने वाले युगों का दर्शन अंकुरित हो रहा था।