डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव–
रात्रि अपने पूर्ण विस्तार पर थी।
आकाश तारों से भरा हुआ था। ऐसा प्रतीत होता था मानो अनन्त ब्रह्माण्ड अपनी असंख्य आँखों से पृथ्वी की ओर देख रहा हो।
राम निद्रा में थे।
लक्ष्मण धनुष पर हाथ रखे पहरा दे रहे थे।
किन्तु सीता की आँखों में नींद नहीं थी।
आज उनके जीवन का पहला ऐसा दिन था जब वे राजमहलों की संगमरमरी दीवारों से दूर, खुले आकाश के नीचे धरती को शय्या बनाकर बैठी थीं।
पर आश्चर्य यह था कि उन्हें दुःख कम और एक विचित्र प्रकार का वैराग्य अधिक अनुभव हो रहा था।
वे दूर बहती हुई नदी को देख रही थीं।
जल की धारा निरन्तर बह रही थी।
न वह पीछे लौट रही थी।
न उसे अपने उद्गम का मोह था।
न उसे अपने गन्तव्य का भय।
वह केवल बह रही थी।
अचानक सीता के भीतर एक विचार कौंधा—
“क्या जीवन भी इसी नदी की भाँति नहीं है?”
मनुष्य बार-बार पीछे लौटना चाहता है।
बीते हुए सुखों को पकड़ लेना चाहता है।
वह चाहता है कि समय ठहर जाए।
माता-पिता का स्नेह कभी समाप्त न हो।
यौवन कभी ढले नहीं।
प्रियजन कभी दूर न जाएँ।
किन्तु जीवन नदी है।
और नदी का धर्म रुकना नहीं, बहना है।
यह सोचते ही उनकी आँखों में जनकपुर की स्मृतियाँ तैर उठीं।
उन्हें स्मरण आया—
जब वे छोटी थीं और राजा जनक उन्हें अपने साथ उपवनों में ले जाया करते थे।
जनक केवल राजा नहीं थे।
वे दार्शनिक थे।
ऋषि थे।
ज्ञानी थे।
वे अनेक बार छोटी सीता से कहा करते—
“पुत्री!
संसार की सबसे बड़ी भूल यह है कि मनुष्य वस्तुओं को अपना मान लेता है।
जिस दिन वह समझ लेगा कि यहाँ कुछ भी उसका नहीं है, उसी दिन दुःख समाप्त हो जाएगा।”
तब बालिका सीता इन बातों को नहीं समझ पाती थीं।
किन्तु आज वन में बैठी हुई उन्हें प्रत्येक शब्द का अर्थ समझ में आ रहा था।
उन्होंने मन ही मन कहा—
“पिताश्री!
आज समझ रही हूँ कि आप मुझे राजकुमारी नहीं, साधक बनाना चाहते थे।
आप चाहते थे कि मैं परिस्थितियों से बड़ी बनूँ।
आप चाहते थे कि सुख मुझे बाँध न सके और दुःख मुझे तोड़ न सके।”
उनकी आँखों से अश्रु बह निकले।
यह वियोग था।
किन्तु इस वियोग में भी एक मधुरता थी।
क्योंकि जिनकी स्मृति उन्हें रुला रही थी, उन्हीं की शिक्षा उन्हें सम्भाल भी रही थी।
अचानक उन्हें माता सुनयना की याद आई।
माता का स्नेह तो दर्शन नहीं समझता।
वह केवल हृदय को समझता है।
उन्हें लगा जैसे माता उनके सिर पर हाथ फेर रही हों।
जैसे कह रही हों—
“बेटी!
तुमने भोजन किया या नहीं?”
बस इतना सोचते ही उनका हृदय भर आया।
आज तक उन्होंने कभी स्वयं भोजन नहीं बनाया था।
आज वन में वे स्वयं कन्द-मूल एकत्र कर रही थीं।
परन्तु उन्हें अपने कष्ट की चिन्ता नहीं थी।
चिन्ता थी तो केवल इस बात की कि माता इस समय कितनी व्याकुल होंगी।
उन्होंने आँखें बन्द कर लीं।
और एक प्रश्न स्वयं से पूछा—
“क्या यही प्रेम है?”
और भीतर से उत्तर आया—
“नहीं।
यह प्रेम का एक पक्ष है।
प्रेम केवल किसी को याद करना नहीं।
प्रेम किसी के दुःख को अपने भीतर अनुभव करना है।”
उन्हें अचानक महारानी कौशल्या की याद आई।
वह वृद्ध माता, जिनके जीवन का केन्द्र राम थे।
आज उनका राम वन में था।
उन्होंने सोचा—
“इस समय माता कौशल्या क्या कर रही होंगी?
क्या वे सो पाई होंगी?
क्या उनकी आँखें भी मेरी ही भाँति जाग रही होंगी?”
उनका हृदय करुणा से भर उठा।
और तभी पहली बार उन्हें अनुभव हुआ कि वियोग केवल अपना नहीं होता।
प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने वियोग को ढो रहा होता है।
राम पिता से दूर हैं।
दशरथ पुत्र से दूर हैं।
माताएँ अपने पुत्रों से दूर हैं।
जनक अपनी पुत्री से दूर हैं।
और वे स्वयं उन सब से दूर हैं।
सम्पूर्ण संसार मानो किसी न किसी वियोग में जी रहा है।
तभी उनके भीतर एक और विचार उत्पन्न हुआ।
“यदि संसार वियोग से भरा है, तो मनुष्य जीता कैसे है?”
बहुत देर तक वे इसी प्रश्न पर विचार करती रहीं।
फिर धीरे-धीरे उन्हें उत्तर मिला।
मनुष्य स्मृतियों से नहीं जीता।
मनुष्य आशा से जीता है।
यदि आशा न हो तो जीवन का एक भी दिन सम्भव नहीं।
उन्होंने राम की ओर देखा।
राम निश्चिन्त निद्रा में थे।
उनके मुख पर अद्भुत शान्ति थी।
सीता के भीतर अचानक एक और प्रश्न उठा—
“ये कैसे मनुष्य हैं?”
राज्य छिन गया।
पिता वृद्ध हैं।
माताएँ रो रही हैं।
अयोध्या शोक में डूबी है।
फिर भी इनके मुख पर इतनी शान्ति कैसे है?
फिर उन्हें उत्तर स्वयं मिल गया।
राम परिस्थितियों में नहीं जीते।
राम सिद्धान्तों में जीते हैं।
जो व्यक्ति परिस्थितियों के अनुसार जीता है, वह प्रत्येक परिवर्तन पर टूट जाता है।
जो सिद्धान्तों के अनुसार जीता है, उसे संसार की कोई शक्ति विचलित नहीं कर सकती।
उनकी दृष्टि राम के चरणों पर टिक गई।
वे मन ही मन बोलीं—
“आर्यपुत्र!
लोग आपको केवल मेरे पति के रूप में देखते हैं।
पर मैं आपको उससे कहीं अधिक देखती हूँ।
मैं आपको उस आदर्श के रूप में देखती हूँ जो मनुष्य को देवत्व की ओर ले जाता है।”
वन की हवा और शीतल हो चली थी।
दूर कहीं किसी पक्षी की करुण पुकार सुनाई दी।
उस पुकार में भी उन्हें वियोग का संगीत सुनाई दिया।
अचानक उन्हें लगा—
सम्पूर्ण सृष्टि किसी न किसी प्रिय की खोज में है।
नदियाँ समुद्र की खोज में हैं।
लताएँ वृक्षों की खोज में हैं।
पृथ्वी वर्षा की खोज में है।
आत्मा परमात्मा की खोज में है।
और प्रेमी अपने प्रिय की खोज में है।
शायद इसी खोज का नाम जीवन है।
और इसी खोज का दूसरा नाम प्रेम।
उनकी आँखों से पुनः अश्रु बह निकले।
पर इस बार वे दुःख के आँसू नहीं थे।
वे आत्मबोध के आँसू थे।
उन्हें अनुभव हुआ कि वनवास वास्तव में दण्ड नहीं है।
यह आत्मा की यात्रा है।
यह उस आवरण को हटाने की प्रक्रिया है जो मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप से दूर रखता है।
उस रात्रि सीता बहुत देर तक जागती रहीं।
और जब अन्ततः उनकी आँख लगी, तब उनके अन्तर्मन में केवल एक ही विचार था—
“संसार का सबसे बड़ा सुख प्रिय के साथ रहना नहीं है।
संसार का सबसे बड़ा सुख उस योग्य बन जाना है कि प्रिय के दुःख को भी प्रेमपूर्वक स्वीकार किया जा सके।”
और उसी क्षण जनकनन्दिनी का प्रेम साधारण दाम्पत्य से ऊपर उठकर तप, धर्म और आध्यात्मिक समर्पण का स्वरूप धारण कर चुका था।