डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव–
वन की वह संध्या अत्यन्त विलक्षण थी। आकाश पर धूसर मेघों की पतली परतें तैर रही थीं। सूर्य अस्ताचल की ओर झुक रहा था, पर उसकी लालिमा मानो धरती के हृदय में उतर रही थी। मंदाकिनी का जल असामान्य रूप से शांत था। वायु चल रही थी, किन्तु पत्तियाँ नहीं हिल रही थीं। वन के पशु-पक्षियों के व्यवहार में एक अनकही व्याकुलता थी।
सीता कुछ क्षणों तक निःशब्द खड़ी रहीं। उन्होंने दूर दृष्टि डालते हुए कहा— आर्यपुत्र! आज वन मौन नहीं है। यह हमसे कुछ कहना चाहता है।
राम ने विस्मित होकर पूछा— देवि! मुझे तो सब कुछ सामान्य दिखाई देता है। किस आधार पर तुम ऐसा कह रही हो?
सीता ने समीप खड़े एक साल वृक्ष की ओर संकेत किया और कहा प्रभु! देखिए, इस वृक्ष की ऊपरी शाखाओं पर बैठे शुक और सारिका बार-बार दक्षिण दिशा की ओर उड़कर लौट रहे हैं। वे अपना घोंसला नहीं छोड़ रहे, केवल दिशा देख रहे हैं। यह उनके भय का संकेत है।
उधर हिरणों का झुंड जल पीकर भी वन के भीतर नहीं गया। वे खुले स्थान पर खड़े हैं। यह उनका स्वभाव नहीं और देखिए उस नदी को। उसकी सतह शांत है, किन्तु भीतर की छोटी मछलियाँ बार-बार ऊपर आ रही हैं। जल के भीतर वायु का दबाव बदल रहा है। रात्रि तक वर्षा अवश्य होगी।
लक्ष्मण विस्मय से उन्हें देखने लगे और पूछा माँ! आपने यह सब कैसे जान लिया?
सीता मुस्करायीं और कहने लगीं, लक्ष्मण! जो भूमि की पुत्री होती है, वह पृथ्वी की धड़कन सुनना सीख जाती है। धरती बोलती नहीं। वह संकेत देती है जो मनुष्य अपने भीतर के शोर को शांत कर लेता है, वही उन संकेतों को सुन पाता है।
राम गम्भीर हो उठे। देवि! क्या वास्तव में प्रकृति इतनी संवेदनशील होती है?
सीता ने उत्तर दिया— प्रकृति वस्तु नहीं है, प्रभु। वह चेतना है।
मनुष्य स्वयं को बुद्धिमान समझकर यह भूल गया है कि वह प्रकृति का स्वामी नहीं, उसकी सन्तान है।
पक्षी मौसम नहीं पढ़ते। वे प्रकृति का मन पढ़ते हैं। पशु दिशा नहीं देखते। वे पृथ्वी की स्पंदन-रेखा को अनुभव करते हैं। नदियाँ केवल जल नहीं बहातीं। वे समय को बहाती हैं। पर्वत केवल पत्थर नहीं होते। वे धैर्य के ऋषि होते हैं।
और वृक्ष… वृक्ष तो मौन तपस्वी हैं। वे बोलते नहीं, फिर भी सबसे अधिक देते हैं।
कुछ दूरी पर बैठते हुए सीता ने अपनी हथेली से मिट्टी उठाई। धीरे-धीरे उसे देखते हुए बोलीं— आर्यपुत्र! लोग इस मिट्टी को धूल समझते हैं। किन्तु यही मिट्टी शरीर बनती है। इसी से अन्न उगता है। इसी से वन जन्म लेते हैं। इसी में राजमहल बनते हैं और अन्ततः इसी में सम्राट और भिक्षुक दोनों समा जाते हैं। पृथ्वी सबसे बड़ी दार्शनिक है। वह सबको धारण करती है, किन्तु किसी से कुछ माँगती नहीं। राम की आँखें स्थिर हो गईं। उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ मानो स्वयं वेद बोल रहे हों।
कुछ क्षणों तक मौन रहा। फिर सीता की दृष्टि आकाश पर टिक गई।
“प्रभु! क्या आपने कभी सोचा है कि बादल और समुद्र का सम्बन्ध कितना विचित्र है?
बादल समुद्र से जन्म लेते हैं और फिर उसी से दूर चले जाते हैं। धरती पर बरसते हैं। नदियाँ बनते हैं और अन्ततः पुनः उसी समुद्र में लौट जाते हैं। यही प्रेम है। यही वियोग है और यही जीवन है।
राम ने पूछा— क्या प्रेम में वियोग आवश्यक है?
सीता ने अत्यन्त गम्भीर स्वर में कहा— जहाँ मिलन है, वहाँ वियोग का बीज पहले से उपस्थित होता है और जहाँ वियोग है, वहीं प्रेम की वास्तविक परीक्षा होती है। मिलन में प्रेम दिखाई देता है। वियोग में प्रेम सिद्ध होता है।
लक्ष्मण ने विनम्र होकर पूछा— माँ! धर्म क्या है? क्या केवल आज्ञा का पालन ही धर्म है?
सीता ने उत्तर दिया— नहीं पुत्र। धर्म आदेश नहीं है। धर्म वह है जो किसी दूसरे के जीवन में भय कम कर दे, जो किसी की पीड़ा घटा दे, जो किसी निर्बल का सहारा बन जाए, जो स्वयं दुःख सहकर भी दूसरे को सुख दे सके; वही धर्म है। यदि कोई शास्त्र मनुष्य को कठोर बना दे, तो समझो उसने शास्त्र पढ़ा है, धर्म नहीं।
उसी समय एक घायल सारस धीरे-धीरे चलता हुआ उनके समीप आया। सीता तत्काल उठीं। उन्होंने अपने वस्त्र का अंश फाड़कर उसके पंख पर बाँधा। राम उन्हें देखते रहे।
सीता बोलीं— प्रभु! मनुष्य सोचता है कि वही सबसे बड़ा ज्ञानी है। किन्तु इस सारस ने मुझे त्याग सिखाया है। यह अपने घायल साथी को छोड़कर नहीं गया।
वह देखिए— दूसरा सारस दूर खड़ा प्रतीक्षा कर रहा है। यही निष्ठा है। यही धर्म है। मनुष्य ने धर्म ग्रन्थों से सीखा। प्रकृति ने उसे जीकर दिखाया।
अचानक आकाश में बिजली चमकी। वर्षा की पहली बूँद सीता की हथेली पर गिरी। उन्होंने आँखें बन्द कर लीं और फिर अत्यन्त मन्द स्वर में बोलीं— मैं जनक की पुत्री बाद में हूँ। मैं पृथ्वी की पुत्री पहले हूँ। मेरे रक्त में मिट्टी की गन्ध है। मेरी श्वास में वर्षा की नमी है। मेरी स्मृतियों में खेतों की हरियाली है। मेरे हृदय में समस्त जीवों के लिए समान करुणा है।
यदि कभी संसार मुझे केवल किसी की पत्नी के रूप में याद करे, तो वह मेरे अस्तित्व का केवल एक अंश जानेगा।
मैं उस धरती की पुत्री हूँ, जो सबको धारण करती है, पर किसी से अपना परिचय नहीं माँगती।
राम की आँखें नम हो उठीं। उन्होंने धीरे से कहा— “देवि! आज मैं तुम्हें पहले से भी अधिक नहीं, अपितु बिल्कुल नए रूप में देख रहा हूँ। तुम मेरे साथ वन में नहीं आई हो। वन तुम्हारे साथ चल रहा है।”
वन में वर्षा प्रारम्भ हो चुकी थी। धरती की सौंधी सुगन्ध चारों ओर फैल रही थी। ऐसा लग रहा था मानो स्वयं प्रकृति ने भूमिसुता के वचनों पर अपनी मौन स्वीकृति की मुहर लगा दी हो।