सीता : प्रेम, धर्म और वियोग की अग्नि में तपता हुआ स्वर्ण

सुमन्त्र का रथ दृष्टि से ओझल हो चुका था।

वन की निस्तब्धता में अब केवल पत्तों की हल्की सरसराहट थी। किन्तु उस निस्तब्धता के भीतर भी सीता के हृदय में असंख्य स्वर उठ रहे थे। वे बाहर से जितनी स्थिर दिखाई दे रही थीं, भीतर उतना ही प्रचण्ड ज्वार उमड़ रहा था।

वे एक विशाल शाल-वृक्ष के नीचे बैठ गईं। राम और लक्ष्मण आगे वनपथ का निरीक्षण करने चले गये थे।

क्षण भर के लिए वे अकेली थीं और मनुष्य जब संसार से अकेला होता है, तभी वह अपने आप से मिल पाता है। उनकी दृष्टि दूर क्षितिज पर टिक गई। अचानक उन्हें मिथिला स्मरण हो आई।

पिता जनक का वह विशाल राजप्रासाद…
माता सुनयना का स्नेह…
सखियों का हँसना…
उद्यानों में खिलते हुए पुष्प…

सब कुछ जैसे चलचित्र की भाँति आँखों के सामने तैरने लगा। किन्तु उस स्मृति के साथ एक पीड़ा भी थी। यह पीड़ा सुख छोड़ने की नहीं थी। यह पीड़ा उन लोगों से दूर हो जाने की थी जो उन्हें प्रेम करते थे। मनुष्य सुखों से नहीं बँधता। मनुष्य प्रेम से बँधता है और यही बन्धन सबसे मधुर होते हुए भी सबसे अधिक पीड़ादायक होता है।

सीता ने मन ही मन कहा— हे पिता! आपने मुझे बचपन से सिखाया था कि धर्म केवल शास्त्रों के पन्नों में नहीं रहता। धर्म जीवन के निर्णयों में प्रकट होता है। आज आपकी वही शिक्षा मेरी शक्ति बनी है।

यदि मैं केवल सुख की इच्छा करती तो शायद लौट जाती। किन्तु आपने मुझे सिखाया था कि सत्य सुविधा से बड़ा होता है। उनकी आँखें भर आईं। किन्तु यह दुर्बलता के आँसू नहीं थे। यह स्मृति और श्रद्धा के आँसू थे।


थोड़ी देर बाद राम लौटे। उन्होंने देखा कि सीता मौन बैठी हैं। उनके मुख पर गम्भीरता की ऐसी छाया थी जो सामान्यतः दिखाई नहीं देती थी। राम उनके समीप आकर बैठ गये। कुछ क्षण दोनों मौन रहे। दो ऐसे व्यक्तित्व, जिनके बीच शब्दों की आवश्यकता बहुत कम थी।

अन्ततः राम ने कहा— सीते! यदि तुम्हारे मन में कोई क्लेश हो तो कहो। सीता ने उनकी ओर देखा। उनकी आँखों में प्रेम था, श्रद्धा थी, और कहीं गहराई में एक ऐसी वेदना थी जिसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।

उन्होंने धीरे से कहा— आर्यपुत्र! क्या कभी आपने विचार किया है कि वियोग का सबसे बड़ा दुःख क्या होता है? राम ने प्रश्नवाचक दृष्टि से उनकी ओर देखा।

सीता बोलीं— लोग समझते हैं कि किसी प्रिय वस्तु या व्यक्ति से दूर हो जाना ही वियोग है। किन्तु मुझे लगता है कि वास्तविक वियोग उससे भी गहरा होता है। वियोग तब होता है जब मन पीछे लौटना चाहता है और धर्म आगे बढ़ने को कहता है। वियोग तब होता है जब हृदय रोना चाहता है और कर्तव्य मुस्कुराने को बाध्य करता है। वियोग तब होता है जब स्मृतियाँ बुलाती हैं और सत्य हमें आगे धकेलता है।

राम मौन सुनते रहे।


सीता आगे बोलीं— आज जब तात सुमन्त्र लौट रहे थे तब एक क्षण के लिए मेरे मन में भी विचार आया था कि यदि मैं अयोध्या लौट जाऊँ तो सब प्रसन्न हो जाएँगे।

माताएँ प्रसन्न होंगी। महाराज प्रसन्न होंगे। समस्त नगर प्रसन्न होगा। किन्तु उसी क्षण मैंने अपने भीतर एक और स्वर सुना। उसने पूछा— सीते! क्या तुम्हारा सुख दूसरों की प्रसन्नता में है या अपने धर्म में?

और मैं काँप उठी।”


राम ने धीरे से पूछा— फिर तुम्हें क्या उत्तर मिला?

सीता मुस्करायीं। वह मुस्कान आँसुओं से भी अधिक मार्मिक थी।

उन्होंने कहा— मुझे उत्तर मिला कि धर्म के बिना प्राप्त किया गया सुख वास्तव में सुख नहीं होता। वह केवल एक सुन्दर भ्रम होता है और भ्रम चाहे कितना भी आकर्षक क्यों न हो, अन्ततः टूट ही जाता है।


वन की संध्या धीरे-धीरे गहरी हो रही थी। आकाश में लालिमा फैलने लगी थी। उस लालिमा को देखते हुए सीता बोलीं— आर्यपुत्र! संसार प्रेम को बहुत छोटा करके देखता है। लोग सोचते हैं कि प्रेम केवल साथ रहने का नाम है। परन्तु मैं सोचती हूँ कि प्रेम साथ रहने से अधिक साथ निभाने का नाम है।

यदि प्रेम केवल निकटता होता तो अनेकों लोग प्रेमी कहलाते। किन्तु प्रेम तो तब प्रकट होता है जब कठिनाइयाँ आती हैं।जब सुख चला जाता है। जब जीवन हमारे सामने ऐसे प्रश्न रख देता है जिनका उत्तर आँसुओं से नहीं, साहस से देना पड़ता है।


राम ने देखा कि आज सीता केवल उनकी पत्नी नहीं थीं। वे मानो स्वयं जीवन के रहस्यों को उद्घाटित कर रही थीं।

उन्होंने पूछा— और यदि यह वनवास और भी कठिन हो जाए? यदि भविष्य में इससे भी बड़ी विपत्तियाँ आयें?

सीता ने बिना एक क्षण गंवाए उत्तर दिया— तब भी मैं आपके साथ रहूँगी।

राम ने पुनः पूछा— और यदि संसार तुम्हें समझ न पाए?

“तो भी।”

“यदि लोग तुम्हारे त्याग का सम्मान न करें?”

“तो भी।”

“यदि तुम्हारे प्रेम को दुर्बलता समझ लिया जाए?”

“तो भी।”


अब सीता का स्वर अत्यन्त गम्भीर हो गया।

उन्होंने कहा— मेरा समर्पण संसार के लिए नहीं है। मेरा समर्पण मेरे अन्तःकरण के लिए है। जो त्याग प्रशंसा के लिए किया जाए वह व्यापार है। जो त्याग सत्य के लिए किया जाए वही तप है।


राम की आँखें नम हो गईं। वे जानते थे कि उनके साथ चल रही यह स्त्री केवल एक राजकुमारी नहीं थी। वह उस धर्म की जीवित प्रतिमा थी जिसकी स्थापना के लिए वे स्वयं वन में आये थे।


रात्रि हो चुकी थी। लक्ष्मण ने पर्णकुटी जैसी अस्थायी व्यवस्था कर दी थी। राम विश्राम के लिए चले गये। किन्तु सीता की आँखों में नींद नहीं थी।

वे आकाश की ओर देख रही थीं। अनगिनत तारों से भरा हुआ वह आकाश उन्हें किसी विराट सत्य की याद दिला रहा था।

उन्होंने सोचा—

“मनुष्य कितना विचित्र है। वह जीवन भर स्थाई सुख खोजता है। किन्तु संसार में कुछ भी स्थाई नहीं।

न यौवन।

न वैभव।

न सत्ता।

न शरीर।

फिर भी वह इन्हीं के पीछे भागता रहता है।”


उनकी दृष्टि एक चमकते हुए तारे पर टिक गई। उन्हें लगा जैसे पिता जनक कह रहे हों— सीते! जिसे संसार खोना समझता है, वही आत्मा की प्राप्ति का मार्ग होता है।

उनके हृदय में एक अद्भुत शान्ति उतरने लगी। उन्हें अनुभव हुआ कि वनवास केवल राम का नहीं है। यह उनका भी तप है। यह उनके प्रेम की परीक्षा नहीं है। यह उनके अस्तित्व का परिष्कार है।


उसी रात वन की निस्तब्धता में जनकनन्दिनी ने एक ऐसा सत्य अनुभव किया जिसे बहुत कम लोग समझ पाते हैं—

प्रेम का सर्वोच्च रूप मिलन नहीं होता। प्रेम का सर्वोच्च रूप वह क्षमता है, जिसमें मनुष्य अपने प्रिय के साथ दुःख को भी प्रसाद की तरह स्वीकार कर ले।

जहाँ अधिकार समाप्त हो जाते हैं और समर्पण प्रारम्भ होता है, वहीं से प्रेम की वास्तविक यात्रा शुरू होती है और सीता उस यात्रा पर बहुत आगे निकल चुकी थीं।