फ़िल्म समीक्षा : सच का एहसास कराने में कामयाब है “द कश्मीर फ़ाइल्स”

फ़िल्म में वास्तविक का दस-पन्द्रह फ़ीसद से ज्यादा हिंसा व अत्याचार नहीं, फिर भी सत्य को ढंकने वाले विचार-पङ्गु इतना तिलमिला उठे

“द कश्मीर फ़ाइल्स” अच्छी या बुरी की बहस से परे मैं एक ज़रूरी फ़िल्म मानता हूँ इसे : सन्त समीर

फ़िल्में कम ही देख पाता हूँ, पर कुछ दिनों में इसकी चर्चा इतनी बार सुनी कि जैसे-तैसे मौक़ा निकाल कर देख आया। देखने के बाद अब समझ में आ रहा है कि ज़्यादातर बहसें फ़िल्म के बजाय उसके दायें-बायें के अदृश्य दृश्यों पर क्यों हैं। इस फ़िल्म ने छद्म बुद्धिजीविता के कई दशकों के पाले हुए कीड़ों को बिलबिलाने पर विवश कर दिया है। फ़िल्म देखने से पहले जब मुझे यह सुनने को मिलता था कि इसमें अतिशयोक्तिपूर्ण ढङ्ग से वीभत्स दृश्य दिखाए हैं या कि सब गप्पबाज़ी है और ऐसा कुछ हुआ ही नहीं था, तो मुझे भी यही लग रहा था कि हो सकता है कि फ़िल्मकार ने सस्ती लोकप्रियता के हथकण्डे अपनाए हों, लेकिन जब मैंने फ़िल्म देखी तो मुझे इसके दृश्य वैसे नहीं दिखाई दिए, जैसे कि दक्षिण और वाम की मैदान में युद्धरत सेनाएँ देख रही थीं। एक के जोश या दूसरे के स्यापे के साथ खड़े होकर सच की शिनाख़्त नहीं की जा सकती। सच समझने के लिए इतिहास के उन उपादानों को खँगालने की ज़रूरत है, जो विचारधाराओं के आग्रहों के वशीभूत होकर नहीं तैयार किए गए हैं। जब कश्मीर की विरासत को खण्डहर में बदला जा रहा था तो उस समय की तहरीरों पर निगाह डालिए, होश फ़ाख़्ता हो जाएँगे। यह कड़वा सच है कि हमारे विचारधारा के बीमार बुद्धिजीवियों ने सच पर आवरण चढ़ाने का काम लगातार किया है।

यह ठीक है कि फ़िल्म के जो भी दृश्य हैं, वे सब आज के कैमरों के सामने फ़िल्माए गए हैं, पर जहाँ तक घटनाओं की बात है तो मेरे हिसाब से वे उतनी वीभत्स क़तई नहीं हैं, जितनी कि वास्तव में घटित हुई थीं। स्त्रियों के साथ जो कुछ हुआ, वह तो लगभग नदारद ही है या बेहद कम है। कश्मीर में हुई हैवानियत का इतिहास ऐसा है, जिसके तमाम पात्र अभी ज़िन्दा है। अगर आप इतिहास के पन्ने पलटते हुए विचारधारा की बीमारी से ग्रस्त नहीं हैं, तो समझने में ज़रा भी मुश्किल नहीं होगी कि इस फ़िल्म में सच का शायद दस-पन्द्रह फ़ीसद ही दिखाया गया है। जिन लोगों को लगता है कि ऐसी अमानवीय क्रूरता भला कोई कैसे कर सकता है, तो दरअसल ऐसे लोग भूल जाते हैं कि इस पूरी क्रूरता और एक पूरी क़ौम को अपनी ज़मीन से पलायन करने पर मजबूर कर देने में मानवीयता-अमानवीयता का कोई मामला ही नहीं था, बल्कि इस्लाम और क़ुरान की व्याख्याएँ काम कर रही थीं। अगर काफ़िर का गला काट देने से अल्लाह का काम होता हो, या कि यह जन्नत में प्रवेश करने और 72 हूरे मिलने की गारण्टी हो, तो मौक़ा मिलते ही दूसरी क़ौम का सफ़ाया करने में कैसा अपराध बोध? जिन्हें ये व्याख्याएँ न समझ में आएँ, उन्हें आक्रान्ताओं द्वारा हिन्दू स्त्रियों को उठा ले जाने और उनकी मण्डी लगाने की घटनाओं को इतिहास के पन्नों से तलाशना चाहिए।

मुझे थोड़ी-बहुत उम्मीद अगर है तो वह भारतीय मुसलमानों से है कि वे क़ुरान और इस्लाम की सकारात्मक और भाईचारा बढ़ाने वाली व्याख्याएँ दुनिया को दे सकते हैं, क्योंकि भारत के मुसलमानों में एक बड़ी सङ्ख्या है, जो सदियों से भाईचारा में जीता रहा है। बात यह भी है कि भारतीय मुसलमानों का तालिबानी व्याख्याओं वाला इस्लामीकरण सर्वांश में अभी तक नहीं हो पाया है। हालाँकि यह बात भी सही है कि अतीत में जहाँ-जहाँ भी दूसरी क़ौमों के साथ प्रेम से रहने-जीने की बात मुसलमानों के बीच से उठी, फ़साद के समय ऐसी आवाज़ों को दबा दिया गया। कश्मीर में भी जिन गिने-चुने मुसलमानों ने अमानवीय हत्याओं पर सवाल उठाए, हिन्दुओं का साथ देने की कोशिश की, उन्हें आतङ्कवादियों ने काफ़िरों का साथी घोषित करके मौत के घाट उतार दिया।

वास्तव में हिन्दू हिन्दुस्तान की ऐसी क़ौम है, जिसे बहुसङ्ख्यक होते हुए भी सदियों से अल्पसङ्ख्यकों का पददलित रहना पड़ा है। कारण यही है कि भारत का वृहत्तर समाज हथियारों की भाषा को व्यवहारबहिः मानता रहा है, और इस नाते दीर्घ काल में कई बार उससे चूक हुई है और कायरता उसका सहज धर्म बनती गई है।

बातें बेतरतीब हैं, ज़्यादा हैं, इसलिए फिलहाल फ़िल्म पर उठ रहे प्रश्नों पर ही वापस आते हैं।

जो लोग कह रहे हैं कि इसे फ़िल्म मानना ही नहीं चाहिए या कि इस फ़िल्म में दूसरे पक्ष की बात जानबूझकर नहीं उठाई गई है, उन्हें दुनिया की उन तमाम खण्डित फ्रेम की फ़िल्मों पर भी सवाल उठाने चाहिए, जिन्हें बड़े-बड़े पुरस्कारों से नवाजा गया है। यह बात ज़रूर है कि फ़िल्म हिन्दुओं के साथ दया दिखाने वाले मुसलमान चेहरों को गिन-गिनकर आतङ्कवादियों द्वारा क़त्ल किए जाने की बात तो करती है, पर वह भाषण के तौर पर है और ऐसा कोई दृश्य सिनेमाई भाषा में आँखों के सामने नहीं लाया गया है। ऐसा किया जा सकता था, पर असल में फ़िल्म जिस विस्तार पर ख़ुद को केन्द्रित करती है, उसमें दूसरे पक्ष की प्रासङ्गिकता कितनी है, यह भी सोचने की बात है। असल में दूसरे पक्ष की प्रस्तुति की बात जो लोग करते हैं, वे आमतौर पर वे लोग हैं, जो सदा से कहते आए हैं कि आतङ्कवाद का कोई धर्म नहीं होता, जबकि कड़वी सच्चाई यही है कि इस आतङ्कवाद की शिनाख़्त बिना धर्म के सम्भव ही नहीं है। धर्म को अनुपस्थित कर दीजिए, पूरा इस्लामी आतङ्कवाद समाप्त हो जाएगा। इस आतङ्कवाद में दस प्रतिशत आर्थिक और सामाजिक वजहें हैं, तो नब्बे प्रतिशत मज़हब। 31 जुलाई, 1986 को भारत के एक न्यायाधीश जेड. एस. लोहाट ने एक फ़ैसले में वादी-प्रतिवादी के प्रस्तुत तथ्यों के क़ुरान से मिलान के दौरान पाया था कि क़ुरान में 24 आयतें ऐसी हैं, जो बुत पूजने वालों को, दूसरे मज़हब वालों को, काफ़िरों को क़त्ल करने की वकालत करती हैं और जब तक इन्हें नहीं हटाया जाएगा, तब तक साम्प्रदायिक दङ्गे रोकना मुश्किल है। ज़ाहिर है, अगर दूसरे धर्मों की अपेक्षा मुसलमान युवक आतङ्कवाद की ओर आसानी से क़दम बढ़ाते दिखाई देते रहे हैं, तो इसकी सबसे बड़ी वजह यही है कि क़ुरान को आतङ्कवाद के पक्षधर के रूप में उनके सामने पेश किया जाता रहा है। वास्तव में ऐसी आयतों की सद्भावपरक व्याख्याएँ करके समस्या को काफ़ी हद तक समाधान की तरफ़ ले जाया जा सकता है। अजब है कि जो लोग धर्म को अफ़ीम कहते थकते नहीं, वे पाकिस्तान पोषित कश्मीर के आतङ्कवाद में धर्म को शामिल करने से गुरेज़ करते हैं। जो लोग फ़िल्म को बग़ैर दूसरे पक्ष की मौजूदगी के अधूरी मानते हैं, उनसे सवाल है कि वे ‘शिण्डलर्स लिस्ट’ को कैसे पूरी फ़िल्म मानते हैं। इसमें तो दूसरे पक्ष की कौन कहे, तीसरा, चौथा पक्ष भी सिरे से नदारद है। क्या स्टीवन स्पीलबर्ग से किसी ने सवाल पूछा था?

असल में तुष्टीकरण की परम्परा में आज़ादी के बाद से ही हम पलते रहे हैं, इसलिए नक़ली यथार्थ देखने के आदी होते चले आए हैं। ज़ाहिर है, ऐसी फ़िल्में दूसरे देशों में बन सकती हैं, पर भारत में प्रगतिशील सेक्युलरिज़्म का भूत ऐसा सवार है कि हर जगह सन्तुलन साधने की बीमारी हो गई है। नक़ली यथार्थ देखना हो तो ‘रोज़ा’ , ‘हैदर’ , ‘मिशन कश्मीर’ जैसी फ़िल्में देखिए। सिनेमा की भाषा में ये अच्छी फ़िल्में भले कही जाएँ, पर सन्तुलन साधने के चक्कर में आतङ्कवाद को दूर कहीं महिमामण्डित करती नज़र आती हैं। कश्मीर के आतङ्कवाद पर फ़िल्म बने, और जिसे आतङ्क का शिकार बनाया गया, वह कश्मीरी हिन्दू ही परिदृश्य से लगभग ग़ायब हो, तो इससे बड़ी सिनेमाई विडम्बना और क्या हो सकती है? आख़िर तब समीक्षा के पण्डितों ने सवाल क्यों नहीं उठाए?

एक बात यह भी कही जा रही है कि ‘द कश्मीर फ़ाइल्स’ दो क़ौमों के बीच नफ़रत और दङ्गे-फ़साद फैलाने वाली फ़िल्म है। क्या सचमुच इस फ़िल्म के बाद देश भर में दङ्गा भड़क गया या इस फ़िल्म के पहले क्या हिन्दू और मुसलमानों के बीच नफ़रत की कोई दीवार थी ही नहीं? उलटे अनुमान तो ऐसा लगाया जा सकता है कि यदि अफ़ग़ानिस्तान या पाकिस्तान जैसे देश में मुसलमानों पर हिन्दुओं द्वारा ढाए गए ऐसे किसी क्रूर अत्याचार की कहानी फ़िल्म के रूप में सामने आती तो वहाँ हिन्दुओं का क़त्लेआम ज़रूर शुरू हो जाता। मैं समझता हूँ कि सच कुछ कड़वा हो सकता है, पर इसे छिपाने के बजाय इसका सामना करके सही समाधान निकालने की ज़रूरत महसूस करनी चाहिए। यह सच है कि हिन्दू-मुसलमान दोनों क़ौमों को रहना एक साथ इसी देश में है, पर भाईचारे का रास्ता सच को छिपाने से नहीं निकल सकता। भारत में तमाम मुसलमान हैं, जो इस्लाम को शान्तिपरक धर्म की व्याख्याएँ देना चाहते हैं, पर उन्हें भी बल तभी मिलेगा, जब सच को सच की तरह समझा जाएगा।

अच्छी बात है कि कश्मीर के सच को दशकों से हज़म करते आए प्रगतिवादियों के गाल पर तमाचा ही नहीं, बल्कि एक तरह से खोपड़ी पर जूता मारते हुए उस समय के चश्मदीद रहे कुछ कश्मीरी मुसलमानों ने सामने आने की हिम्मत दिखाई है। उन्होंने उस समय की घटनाओं का वर्णन किया है, जबकि उनके अपने गाँव में कश्मीरी पण्डितों को आतङ्कवादियों ने एक तरफ़ से मौत के घाट उतार दिया था। जो लोग इसे जेनोसाइड मानने से इनकार कर रहे हैं, वे निहायत धूर्त या परले दर्जे के मूर्ख ही हो सकते हैं। फ़िल्म का विरोध सिर्फ़ इसलिए किया जाए कि इस पर भाजपा राजनीति कर सकती है, तो इसे भी मूर्खतापूर्ण ही कहना चाहिए। हर दल राजनीति करने में लगा है तो भाजपा भी आख़िर क्यों नहीं राजनीति करेगी? पहले आप राजनीति कर रहे थे; एक भयावह सच को सिरे से नकार देने की हद तक कर रहे थे, तो अब अगर आप भाजपा को मौक़ा देंगे तो वह भी राजनीति करेगी ही, परेशानी क्या है? सवाल यह है कि कश्मीर का भयावह और दर्दनाक सच, जिसका बहुत बड़ा हिस्सा अभी भी बाहर नहीं आ सका है, उसे आप समझना चाहेंगे या नहीं?

मैं उस मुसलमान लड़की को सलाम करता हूँ, जिसने मौलवियों से साफ़ कहा है कि हम मुसलमानों को कश्मीरी हिन्दुओं के दर्द को महसूस करना चाहिए और उनसे माफ़ी माँगनी चाहिए कि हमारे ही परिवारों में से कुछ लोगों ने पाकिस्तानी आतङ्कियों का साथ दिया, कश्मीरी हिन्दुओं का बेरहमी से क़त्ल किया और उनकी बहू-बेटियों की इज़्ज़त को तार-तार किया।

ख़ैर, फ़िल्म और बेहतर बन सकती थी। समरसता का कोई सङ्केत भी दे सकती थी, पर जैसी भी है, सच का एहसास कराने में कामयाब है। हिन्दू हों या मुसलमान, जिनकी संवेदनाएँ पत्थर न हो गई हों, उन्हें एक बार इसे देखना ही चाहिए। फ़िल्म देखिए, फ़िल्म के इर्द-गिर्द चल रही राजनीति को भी देखिए, लेकिन अगर आप तथाकथित सद्भाव के नाम पर सच को सामने नहीं आने देना चाहते तो मेरा मानना है कि आप भी सही सद्भाव का रास्ता अवरुद्ध करने की राजनीति कर रहे हैं।

सन्त समीरजी प्रख्यात गांधीवादी विचारक, लेखक हैं

—सन्त समीर