★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
धर्म क्या है? हिन्दू-मुसलमान, सिक्ख (‘सिख’ अशुद्ध है।), जैन, पारसी आदिक अथवा कुछ और?
धर्म की अवधारणा क्या है– ‘जय श्री राम? जय सियाराम? अल्लाहो अकबर? दलित हनुमान् या फिर कुछ और? गोशाला खोलकर हिंसा का वातावरण बनाना धर्म है या फिर व्रत-पर्वों-त्योहारों के नाम पर भैंस, गाय, बकरी-बकरों-भेंड़ आदिक को काटकर अपने अभीष्ट देव-देवी को प्रसन्न करने के लिए चढ़ावा चढ़ाना? लव-जिहाद (‘जेहाद’ अशुद्ध है।), दंगा, आतंक, नरसंहार आदिक धर्म हैं?
मनुष्य-द्वारा बनाये गये ‘धर्मों’ के नाम पर समाज को काटा और बाँटा जा रहा है। यदि यही धर्म है तो उस धर्म को भस्मीभूत करने के लिए पहल ‘मेरी’ ओर से होगी।
हमारा समाज जिसे धर्म समझता आ रहा है, वह विषबेल है। पूजा-पाठ, नमाज़, व्रत, रोज़ा आदिक आपकी आस्था है; आपकी ज़रूरत है; आपके पाप को पुण्य मे बदलने-बदलवाने का एक माध्यम है, न कि धर्म है और न ही मज़हब है।
मत भूलिए– “अभाव मे ‘भाव’ का दर्शन कराना परम धर्म है।”
(सर्वाधिकार– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १ अप्रैल, २०२२ ईसवी।)