आप यदि भाषा-शुचिता के पक्षधर नहीं तो ‘अपना मार्ग’ अलग कर लें

—-०दो टूक०—-

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

जो भी व्यक्ति इस विषय का पक्षधर है कि उसके लिए ‘भाषा-शुचिता’ से अधिक ‘मात्र सम्प्रेषणीयता’ का महत्त्व है, वह मेरी मैत्री-सूची से स्वयं को ‘सदैव’ के लिए पृथक् कर लें; क्योंकि मै ‘शब्दानुशासन’ के पक्ष मे ‘एक पैर पर खड़ा शब्दसेवक’ हूँ और ‘शब्द-मर्यादा’ का ‘सर्वकालीन चौकीदार’ भी। ऐसा ‘चौकीदार’ नहीं, जो लोभ अथवा किसी ‘पद-विशेष’ को लपकते ही ‘जनता’ के साथ ‘विश्वासघात’ करते हुए, अपनी ‘चौकीदारी’ छोड़कर ‘बाबूगिरी’ पर उतर आये। मै एक ऐसा ‘शब्दप्रहरी’ हूँ, जो यथाशक्य अपने दायित्व का निर्वहण करता आया है, न कि ‘चौकीदारी’ के नाम पर ‘क्रूर भावनात्मक छल’ करने का कुकृत्य; क्योंकि ऐसा दुष्कृत्य ‘गिरगिटिया चरित्र’ को बहुविध उजागर करता है। कुछ सुशिक्षित लोग जब कहते हैं :– शब्द नहीं, ‘कण्टेण्ट’ को महत्त्व दीजिए तब उनकी बेचारगी और शब्द-असामर्थ्य पर तरस आता है। ऐसे ही लोग आज ‘नकार’ को गले लगाते हुए, हमारी सारस्वत यात्रा मे इस प्रकार से बाधक प्रतीत हो रहे हैं जिस प्रकार से पुरा काल मे तपस्यारत साधकों के कर्ममार्ग मे दानव मांस-मज्जा, हड्डियाँ आदिक फेंककर विघ्न-बाधा उपस्थित किया करते थे।

मुझे उन आभासी-अनाभाषी मित्रों से सुस्पष्ट शब्दों मे कहना है, जो ‘मनोनुकूल प्रतिक्रिया’ और ‘चाहत’ के भूखे रहते हैं और प्राप्त प्रतिक्रियाओं मे अशुद्ध शब्दप्रयोग, वर्तनीदोष तथा अन्य व्याकरणिक अशुद्धियों को देखकर भी ‘गांधी जी के तीन बन्दर’ की भूमिका मे बने रहते हैं :– आप लोग सीमित और कुत्सित-कलुषित स्वार्थ के वशीभूत होकर हमारे शब्द-लोक को कलुषित न करें और न करायें; क्योंकि अन्याय को सहन करनेवाला ‘अन्याय’ करनेवाले की तुलना मे ‘अत्यधिक’ दोषी होता है। ऐसा इसलिए कि आप यदि हमारे भाषिक जगत् मे अराजकता का विस्तार करनेवाले ‘शब्दद्रोहियों’ का साथ देते रहेंगे तो निकट भविष्य मे ‘शब्द-संदूषण’ पर नियन्त्रण कर पाना, आपके लिए “टेढ़ी खीर” हो जायेगी; साथ ही ‘शब्दानुशासन’ के प्रति आप भी कथित दूषण मनोवृत्तिवाले लोग की पंक्ति मे स्वयं को ‘असहाय’ रूप मे बैठा हुआ पायेंगे और एक कालखण्ड ऐसा दिखेगा, जहाँ आप स्वयं को नितान्त निरुपाय-निस्सहाय होकर टुकुर-टुकुर देखते रह जायेंगे। कालान्तर मे, आपका वह ‘आत्म मुग्धकारी’ रूप ‘अवसरवादी’ सिद्ध होता दिखेगा, फिर आप सभी से भी मुझे सावधान बने रहने और पार्थक्य-भाव उत्पन्न करने की आवश्यकता का अनुभव होने लगेगा।

मुझे विषयान्तर टिप्पणी और प्रतिक्रिया के प्रति सम्मोहित मित्र नहीं चाहिए; अपने ‘फ़ोटो प्रोफ़ाइल’ मे अपने स्थान पर किसी अन्य का चित्र लगानेवाले-वाली, पल-पल अपने चेहरे को हटाकर विविध भाव-भंगिमाओं के दर्शन करानेवाले-वाली तथा दो-चार अथवा भीड़ मे अपने के रहते हुए भी ‘न’ दिखनेवाला चित्र तथा सुस्पष्ट चित्र न लगानेवाले-वाली मित्र की कहीं-कोई आवश्यकता नहीं। इनके अतिरिक्त मै उनसे भी दूरी चाहता हूँ, जिनका ‘परिचयरहित प्रोफ़ाइल’ है। ऐसे भी लोग जो मेरे सम्प्रेषण मे ‘मात्र स्वयं तक सीमित रहकर ‘कुछ’ सूँघते रहते हैं, उनकी ‘घ्राणशक्ति’ ‘विहीन’ और ‘रहित’ करने की अब आवश्यकता है। अधिकतर लोग मित्रता का प्रमाणपत्र लेकर वर्षों से ‘सुषुप्त’ और ‘मृतक’ ज्वालामुखी की भाँति पड़े हुए हैं। अब उनके आभासी-अनाभाषी प्रमाणपत्र को भी निरस्त करने का अवसर प्रत्यक्ष हो रहा है।

मैने अब तक के जीवनखण्ड मे ‘विद्रोही’ जीवन को ही अंगीकार किया है; क्योंकि यदि मन मे ‘संकल्प’ होता है तो उसका कोई ‘विकल्प’ नहीं होता; होता है तो एक उद्देश्य, एक ध्येय तथा एक लक्ष्य; और यही मेरा ‘उदात्त स्वार्थ’ भी है, जिसमे मुझे ‘परमार्थ’ का दर्शन होता है तथा जिसकी संपूर्ति-हेतु मेरा ‘शेष जीवन’ भी समर्पित है।

तो आइए! शब्द-शुद्धीकरण (‘शुद्धिकरण’ अशुद्ध है।) की ओर अग्रसर हों।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २८ मई, २०२२ ईसवी।)