● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
एक महान् आत्मा— ”जय जवान-जय किसान” का अनन्य उद्घोष करनेवाले भारतरत्न लालबहादुर शास्त्री जी की सादगी को नमन।
छली प्रधान चौकीदार सुनो!
सादगी की प्रतिमूर्ति भारतरत्न लालबहादुर शास्त्री जी ने भारत के द्वितीय प्रधानमन्त्री बनाये जाने के अनन्तर लाल क़िले के (‘की प्राचीर’ अशुद्ध है।) प्राचीर से राष्ट्र को सम्बोधित करते हुए कहा था, ”हम रहें या न रहें; लेकिन यह झण्डा रहना चाहिए। हम और आप रहें या न रहें; लेकिन भारत का सिर ऊँचा रहेगा।”
….. मगर तुमने तो देश को बाँट दिया है; राष्ट्रध्वज के रंग और वस्त्र बदलकर उसके गौरव को धूमिल कर; हमारे राजचिह्न की आकृति बदलकर, अपनी बीभत्स मनोवृत्ति का परिचय प्रस्तुत करते हुए, अपने भीतर के छद्म राष्ट्रवाद को सतह पर ला दिया है। तुमने भारतीय राजनीति के इतिहास मे अत्यन्त कालिमापूर्ण अध्याय जोड़ दिया है। तुम्हारी अधिनायक-वृत्ति और अतिरिक्त महत्त्वाकांक्षा तुम्हें तुम्हारे परिणाम तक पहुँचायेगी; क्योंकि किसी की भी अतिवादिता का फल नितान्त विषाक्त सिद्ध होता आया है।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २ अक्तूबर, २०२२ ईसवी।)