ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः

सूर्य की प्रथम किरण हिमालय की पर्वत-श्रृंखलाओं को स्वर्णिम आभा से आलोकित कर रही थी। पहाड़ों के बीच स्थित एक छोटा-सा गाँव शिवपुर अपनी सहज सरलता और प्राकृतिक सौन्दर्य के लिए प्रसिद्ध था। उसी गाँव में रहने वाला एक युवक था—अभय।

वह बुद्धिमान था, परन्तु उसके मन में अनेक प्रश्न उठते रहते थे। जीवन का उद्देश्य क्या है? सुख और दुःख क्यों आते हैं? यदि सब कुछ एक दिन समाप्त हो जाना है, तो फिर संघर्ष करने का क्या अर्थ है? वह इन्हीं प्रश्नो के उत्तर पाने को छटपटाता रहता था।

उसके पिता गाँव के विद्यालय में अध्यापक थे और माता अत्यन्त धार्मिक एवं करुणामयी थीं। बचपन से ही अभय ने शास्त्रों की बातें सुनी थीं, किन्तु वे उसके लिए केवल शब्द थे। जीवन का अनुभव अभी शेष था।

समय बीतता गया। अभय उच्च शिक्षा के लिए महानगर चला गया। वहाँ उसने कठिन परिश्रम किया और एक प्रतिष्ठित कम्पनी में नौकरी प्राप्त कर ली। प्रारम्भिक सफलता ने उसे अत्यन्त प्रसन्न किया। ऊँचा वेतन, आलीशान घर, सम्मान और आधुनिक सुविधाएँ—सब कुछ उसके पास था। उसे लगता था कि यही जीवन की पूर्णता है। किन्तु जीवन केवल अनुकूल परिस्थितियों का नाम नहीं है।

कुछ वर्षों बाद कम्पनी आर्थिक संकट में फँस गई और अनेक कर्मचारियों के साथ अभय की भी नौकरी चली गई। जिस सफलता पर उसे गर्व था, वही एक क्षण में उससे दूर हो गई। मित्र धीरे-धीरे दूर होने लगे। आत्मविश्वास डगमगाने लगा। उसे पहली बार लगा कि परिस्थितियाँ कितनी परिवर्तनशील होती हैं।

एक दिन वह अत्यन्त निराश होकर नगर के एक शांत उद्यान में बैठा था। वहीं उसकी भेंट एक वृद्ध संन्यासी से हुई। उनके मुख पर अद्भुत तेज था, किन्तु उससे भी अधिक आकर्षक उनकी सहज मुस्कान थी।

संन्यासी ने पूछा, “वत्स, इतना उदास क्यों हो?”

आर्यन ने उत्तर दिया, “मैंने सब कुछ खो दिया है। मेरा भविष्य अन्धकारमय दिखायी देता है।”

संन्यासी मुस्कुराए और बोले, “क्या वास्तव में सब कुछ खो दिया है?”

अभय ने कहा, “हाँ, नौकरी, प्रतिष्ठा, आत्मविश्वास—सब कुछ।”

संन्यासी ने पास खड़े एक विशाल वटवृक्ष की ओर संकेत किया और बोले, “देखो, इस वृक्ष की कितनी शाखाएँ सूख गई हैं। क्या इससे वृक्ष समाप्त हो गया?”

“नहीं।”

“क्यों?”

“क्योंकि उसकी जड़ें जीवित हैं।”

संन्यासी बोले, “मनुष्य का भी यही सत्य है। परिस्थितियाँ शाखाओं के समान हैं। वे बदलती रहती हैं। यदि आत्मा की जड़ें जागृत हैं, तो जीवन कभी पराजित नहीं होता।”

यह वाक्य अभय के हृदय में उतर गया। अगले दिन वह पुनः संन्यासी के पास पहुँचा। धीरे-धीरे उनका संवाद आरम्भ हुआ। एक दिन संन्यासी ने कहा—

“मानव जीवन अज्ञान से ज्ञान की ओर, सीमितता से अनन्तता की ओर, भय से अभय की ओर तथा बन्धन से मुक्ति की ओर अग्रसर होने वाली एक दिव्य आध्यात्मिक यात्रा है। जीवन की प्रत्येक परिस्थिति चाहे वह सुखद हो या दुःखद, केवल बाहरी घटना नहीं, बल्कि आत्मजागरण का अवसर है।”

अभय ने पूछा, “क्या केवल ज्ञान से दुःख समाप्त हो जाते हैं?”

संन्यासी बोले, “दुःख की घटनाएँ समाप्त नहीं होतीं, परन्तु उनसे बँधने वाला मन बदल जाता है।”

उन्होंने एक पात्र में जल भरकर उसमें चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब दिखाया।

“यदि जल हिलता है तो प्रतिबिम्ब भी काँपता है, किन्तु क्या आकाश का चन्द्रमा काँपता है?”

“नहीं।”

“मन जल के समान है और आत्मा आकाश के चन्द्रमा के समान।”

धीरे-धीरे अभय ने शास्त्रों का अध्ययन आरम्भ किया। उपनिषदों के महावाक्य उसके भीतर नई चेतना जगाने लगे—

“अहं ब्रह्मास्मि।”

“तत्त्वमसि।”

“प्रज्ञानं ब्रह्म।”

“अयमात्मा ब्रह्म।”

अब वह समझने लगा कि मनुष्य केवल शरीर या मन नहीं, बल्कि नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त आत्मा है।

कुछ महीनों बाद उसे पुनः एक नई नौकरी मिली। किन्तु इस बार उसका दृष्टिकोण बदल चुका था। पहले सफलता उसके अहंकार का कारण बनती थी, अब वह उसे ईश्वर की कृपा मानता था। पहले असफलता उसे तोड़ देती थी, अब वह उसे सीख समझने लगा।

उसने अपने वेतन का एक भाग निर्धन विद्यार्थियों की शिक्षा के लिए समर्पित करना प्रारम्भ किया। सप्ताह में एक दिन वह वृद्धाश्रम जाकर वृद्धजनों की सेवा करता। उसे अनुभव हुआ कि दूसरों के चेहरे पर मुस्कान लाने में जो आनन्द है, वह किसी पुरस्कार या वेतन में नहीं।

एक दिन एक विद्यार्थी ने उससे पूछा, “सर! क्या जीवन में केवल परिश्रम ही पर्याप्त है?”

अभय मुस्कुराया।

“परिश्रम आवश्यक है, किन्तु उसके साथ सही दृष्टि भी चाहिए। यदि कर्म केवल स्वार्थ के लिए होगा तो थकान देगा। यदि वही कर्म सेवा बन जाए तो साधना बन जाता है।”

उसने विद्यार्थियों को श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक सुनाया—

“मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।”

फिर बोला, “सुख और दुःख दोनों अतिथि हैं। दोनों आएँगे और चले जाएँगे। इसलिए किसी से अत्यधिक आसक्त मत बनो।”

समय के साथ अभय स्वयं एक प्रेरणास्रोत बन गया। लोग उसके पास अपनी समस्याएँ लेकर आने लगे।

एक व्यापारी बोला, “व्यापार में बहुत हानि हो गई है।”

अभय ने कहा, “हानि केवल धन की हुई है या धैर्य की भी?”

व्यापारी मौन हो गया।

एक छात्र बोला, “मैं परीक्षा में असफल हो गया।”

अभय ने उत्तर दिया, “असफलता परिणाम है, पहचान नहीं।”

एक वृद्ध महिला बोली, “मैं अकेली हूँ।”

अभय ने उनका हाथ पकड़कर कहा, “जहाँ प्रेम है, वहाँ कोई अकेला नहीं होता।”

धीरे-धीरे उसे अनुभव होने लगा कि जीवन का वास्तविक सुख लेने में नहीं, देने में है।

वर्षों बाद वही संन्यासी पुनः उससे मिलने आए।

उन्होंने पूछा, “वत्स, अब जीवन कैसा लग रहा है?”

अभय ने विनम्रता से उत्तर दिया—

“पहले मैं संसार को बदलना चाहता था। अब स्वयं को समझने का प्रयास करता हूँ। पहले मैं सफलता खोज रहा था। अब सत्य खोज रहा हूँ।”

संन्यासी प्रसन्न हुए।

उन्होंने कहा—

“स्मरण रखो, आत्मज्ञान कर्म का निषेध नहीं करता; वह कर्म को उपासना में रूपान्तरित कर देता है। श्रेष्ठता के साथ कर्म करो, करुणा के साथ सेवा करो, मधुरता के साथ बोलो, श्रद्धा के साथ साधना करो तथा विनम्रता और कृतज्ञता के साथ जीवन जियो।”

फिर उन्होंने ईशावास्योपनिषद् का महान् उद्घोष सुनाया—

“ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।”

अभय ने अनुभव किया कि वास्तव में सम्पूर्ण जगत उसी एक परमात्मा से व्याप्त है।

एक दिन ध्यान में बैठा हुआ वह स्वयं मे ही डूब गया। उसे अनुभव हुआ कि शरीर स्थिर है, मन शांत है, विचार विलीन हो रहे हैं; परन्तु एक शक्ति उसके भीतर निरन्तर प्रकाशित है। उसी क्षण उसे उपनिषद् का वचन स्मरण हुआ—

“न जायते म्रियते वा कदाचित्।”

उसकी आँखों से आनन्द के आँसू बहने लगे। अब वह समझ चुका था कि आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है। भय केवल अज्ञान का परिणाम है।

उसने अनुभव किया कि अद्वैत वेदान्त ईश्वर का निषेध नहीं करता, बल्कि उसकी सर्वोच्च अनुभूति कराता है। जहाँ द्वैत समाप्त होता है, वहीं भय भी समाप्त हो जाता है।

उसे बृहदारण्यक उपनिषद् का वचन स्मरण हुआ—

“द्वितीयाद्वै भयं भवति।”

उस दिन से उसके जीवन में आशा परिस्थितियों पर आधारित नहीं रही। उसका उत्साह उपलब्धियों पर निर्भर नहीं रहा। उसका विश्वास किसी बाहरी वस्तु से नहीं, अपने आत्मस्वरूप से जुड़ गया।

वृद्धावस्था आने लगी। शरीर पहले जैसा सबल नहीं रहा, किन्तु मन पहले से कहीं अधिक प्रसन्न था। लोग उसके पास प्रेरणा लेने आते और वह केवल इतना कहता—

“सदैव आशावादी रहिए; इस कारण नहीं कि परिस्थितियाँ अवश्य बदल जाएँगी, बल्कि इसलिए कि आपका वास्तविक स्वरूप पूर्ण, अखण्ड और अविनाशी है। संसार परिवर्तनशील है, किन्तु आपके भीतर स्थित साक्षी चैतन्य सदा अपरिवर्तित रहता है।”

अभय आगे कहता—

“निःस्वार्थ सेवा कीजिए, निष्काम कर्म कीजिए, निष्कपट प्रेम कीजिए, एकाग्र होकर ध्यान कीजिए और पूर्ण विश्वास के साथ ईश्वर पर आश्रित रहिए।”

अपने जीवन की अंतिम संध्या में वह शांत भाव से गंगा के तट पर बैठा अस्त होते सूर्य को देख रहा था। उसके चेहरे पर वही संतोष था जो केवल आत्मबोध से उत्पन्न होता है।

अभय ने धीरे-धीरे आँखें बंद कीं और अन्तिम बार कहा—

“मुक्ति कोई नई उपलब्धि नहीं, अपितु अपने शाश्वत स्वरूप की पुनः पहचान है। हम सीमित होकर अनन्त की खोज नहीं कर रहे; हम स्वयं वही अनन्त ब्रह्म हैं जो इस सीमित व्यक्तित्व के माध्यम से अभिव्यक्त हो रहा है।”

उसके होंठों पर अंतिम शब्द थे—

“ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः।”

गंगा की लहरें बहती रहीं। सूर्य अस्त हुआ, परन्तु प्रकाश समाप्त नहीं हुआ। क्योंकि वास्तविक प्रकाश बाहर नहीं, भीतर जाग चुका था। यही सर्वोच्च आशावाद है। यही सर्वोच्च निर्भयता है। यही परम स्वतंत्रता है। यही सनातन, सार्वकालिक और सार्वभौमिक सन्देश है।