● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
गुजरात के मोरबी मे ‘मच्छु नदी’ पर निर्माण कराये गये ‘केबल पुल’/’सस्पेंशन ब्रिज’ (मौरबी पुल) के एक हिस्से के टूटकर नदी मे गिर जाने से १०० से अधिक लोग की डूबकर मृत्यु हो चुकी है। यह घटना आज (३० अक्तूबर) अपराह्ण ६.३४ बजे घटी है। वह पुल ‘झूलता हुआ पुल’ के नाम से जाना जाता है। उस पुल पर जाने के लिए प्रतिव्यक्ति १५ रुपये का टिकट लगाया जाता है।
घटना के समय लगभग ५०० लोग पुल पर थे। लोग एक-के-पीछे-एक एक-दूसरे को धक्का देते हुए बढ़ रहे थे; झूलते हुए उस पुल को हिला भी रहे थे। वह पुल ‘कौतुक’ का विषय था। लोग देश-विदेश से उस पुल को देखने के लिए आते थे। आज रविवार था, इसलिए लोग की बड़ी भीड़ थी। जिस तरह की भीड़ दिख रही थी, उसे बेशक, ‘भेंड़िया धँसान’ कह सकते हैं। दूसरी ओर, प्रशासन की ओर से मृतकों की वास्तविक संख्या छुपायी जा रही है। मोरबी का प्रशासन मृतकों की संख्या कभी ३० बता रहा है तो कभी ४०, जबकि गुजरात के श्रममन्त्री बृजेश मेरजा ६० बता रहे हैं। उस घटना के शिकार सैकड़ों लोग को शासकीय और निजी चिकित्सालयों मे भरती (‘भर्ती’ अनुपयुक्त शब्द है।) कराया गया है; परन्तु मच्छु नदी मे डूबनेवाले लोग की जिस स्तर पर अनदेखी की जा रही है, वह निन्दनीय है और विचारणीय भी।
डूबने का मंज़र देखा जाये तो डूब रहे बच्चे, महिलाएँ तथा बूढ़े लोग ‘सहायता’ के लिए चिल्ला रहे थे; परन्तु शासन और प्रशासनस्तर पर बेहद उदासीनता दिखी है। डूब रहे लोग को बचाने के लिए सही समय पर समुचित व्यवस्था नहीं की गयी थी। यही कारण था कि नदी मे गिरे हुए लोग ही एक-दूसरे को बचाते हुए दिख रहे थे। कुछ समय-बाद स्थानीय लोग भी मदद के लिए उतरे और जो बन सकता था, किये। आश्चर्य है! लगभग ५ घण्टे-पहले पुल टूटकर गिरा और लोग डूबते रहे; मरते रहे; परन्तु गुजरात के मुख्यमन्त्री भूपेन्द्र पटेल लगभग ११ बजे मोरबी पहुँचे थे। क्या इसे मुख्यमन्त्री की संवेदनहीनता नहीं कही जायेगी? मुख्यमन्त्री को घटना की सूचना कब दी गयी थी? ११ बजे रात्रि मे सरकारी सुरक्षादल पहुँचा था। यहाँ भी प्रश्न है, घटना अपराह्न ६.३४ की थी और बचाव-दल ११ बजे रात्रि मे पहुँच रहा है, ऐसी लापरवाही क्यों? सरकारी कमाण्डो का रात्रि ११.१५ बजे तक अता-पता नहीं था, क्यों? वायुसेना और नौसेना का रक्षादल कहाँ है?
वह पुल वर्षों से जीर्ण-शीर्ण अवस्था मे था और मरम्मत कराकराकर उसका ‘धन्धा’ के रूप मे उपयोग किया जाता था। लगभग २ करोड़ रुपये ख़र्च करके उसमे सुधार कराया गया था। अब प्रश्न है, वह सुधार किस तरह का था, जो सुधार कराने के तीन दिनो-बाद जनता के लिए खोल दिया गया था और वह चरमरा कर नदी मे गिर पड़ा था? जिस एजेंसी/विभाग की ओर से उपर्युक्त (‘उपरोक्त’ अशुद्ध है।) पुल का जीर्णोद्धार करने के लिए ‘ठीका’ (यहाँ ‘ठेका’ अनुपयुक्त है।) दिया गया था, उसके इंजीनियर, ठीकेदार आदिक कौन-कौन थे और उन्हें किस आधार पर ठीका दिया गया था? पुल को सार्वजनिक रूप से खोलने की अनुमति किसने दी थी?
ग़ौर करने-लायक़ है कि वह पुल लगभग आधा किलोमीटर लम्बा और १० फ़ीट चौड़ा था। वह पुल लगभग १४० वर्ष पुराना था, जिस पर चलने की क्षमता १०० लोग की थी; परन्तु उस समय ५०० से अधिक लोग पुल पर जुटे थे।
प्रशासन की ओर से किसी भी प्रकार की सम्बन्धित जानकारी पाने के लिए अधोलिखित फ़ोन नम्बर जारी किया गया है :–
02822 243300।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ३० अक्तूबर, २०२२ ईसवी।)