मै चरणदास समाज हूँ

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

मेरी नामर्दगी,
मर्दों की टोली का
नेतृत्व कर रही है।
भोले-भाले ज़बाँ पर लगे 
तालों की चाबियाँ,
मुखिया की जेब मे हैं।
वह ललकारता है :–
हैसियत हो तो
जेब की ओर हाथ लाकर दिखा।
मै ठिठुरनभरी सर्दी-मानिन्द,
कुहासेभरे कृष्णपक्ष की रातों-जैसा हूँ :–
कालिख़-पुता चरित्र-चाल-चेहरा लिये;
भागा-भागा; हाँफता-फिरता;
यहाँ-वहाँ मुँह मारता;
फटा तबला-सा दिखता 
मुख-भाग हूँ।
क्योंकि मैं 'गुलाम-वंश' का समाज हूँ।
मुखिया वह जीव है,
जो पाप की परखनली से जन्मा, 
अस्लीयत की आँखों-मे-आँखें-डाल,
किसी माँ की कोख से निकलने का
दावा करता आ रहा है।
जन की आपसी पहचान और परख 
धुँधली कर दी गयी है।
आस्था और विश्वास की गरदन मे रस्सा बाँध,  
उन्हें साथ-साथ;
एक ही डाली पर लटका दिया गया है;
आश्वासन और भरोसा की चमक
"सबका साथ-सबका विश्वास" की 
चकाचौंध रौशनी से,
निष्प्रभ१ कर दी गयी है। 
मंज़िल की ओर उछाल मारनेवाले पैर,
घिसट-घिसटकर बढ़ पा रहे हैं।
दम तोड़ती जवानी की दुरभि-सन्धि२,
विच्छेद की परम्परा से अलग हट,
अवसरवादी लोकतन्त्र की प्रयोगशाला मे,
अभेद की गोद मे
भेद को बैठाने और अभेद को
चिर-निद्रा मे सुलाने के लिए,
अपनी क्रूर और निरंकुश बाँहें फैला चुकी है।
दसों दिशाएँ निस्तब्ध बनी
कातर निगाहों से,
एक क्षैतिज रेखा खींचती हुईं
मन की बात,
मन से कहकर रह जाती हैं।
उनकी दु:ख-दर्द और पीड़ा के पिटारे 
बन्द कर दिये गये हैं।
सिसकियों पर,
'राजद्रोह' का क्रूर पहरा लगा दिया गया है।
अथक-थक की निर्मम कहानियाँ,
जीते-जी मार दी जा रही हैं।
सब कुछ एक ऐसे इतिहास 
बन जाने की ओर धकेली जा रही हैं,
जो किसी देश के 
अलिखित संविधान की भाँति दिखें;
निरंकुशता के पैमाने पर 
वज्र बेहयाई का प्रतिमान३ बनता रहे।
गवाह मौन हैं; 
उनकी आँखों के सामने
हर पल, 
'ई० डी०' और 'सी० बी० आइ०' का 
ख़ौफ़ पसरा रहता है;
क़ानून के साथ बलात्कार कर,
'बुल्डोज़र' से घर गिराने का आशंका भी
आँखों को भयातुर करती दिखती है।
प्रलोभन और भयवश
लोग नाना ख़ानो मे बँटे दिख रहे हैं;
सबके सब अवसरजीवी हैं।
मै तो मुखिया का चरणदास हूँ;
क्रीतदास४ हूँ; संकेतदास५ हूँ;
क्योंकि मै 'ग़ुलामो का ग़ुलाम'
भारतीय समाज हूँ।

शब्दार्थ :– १कान्तिहीन/प्रभाहीन/चमकरहित २कुचक्र/कुमन्त्रणा ३प्रतिच्छाया/परछाईं/प्रतिमूर्ति ४ख़रीदा हुआ ग़ुलाम ५इशारों पर नाचनेवाला ग़ुलाम।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १५ दिसम्बर, २०२२ ईसवी।)