प्रान्शुल त्रिपाठी, रीवा, मध्य प्रदेश
चलो फिर से नए जोश नए उल्लास से नववर्ष मनाते हैं,
रह गए थे जो सपने अधूरे अभी उन्हें अब फिर से सजाते हैं ।
कौन अपना कौन पराया इस भेदभाव को मिटाते हैं,
भूलकर सारे बैर-द्वेष अब सब को गले लगाते हैं ।
दफन करके सारे नफरतों को प्रेम के मीत बुलाते हैं ,
दिल से हटा कर फरेब की फुलझड़ियां अपनत्व की नई दुनिया बनाते हैं।
समाज में फैली हर एक बुराइयों को अब मिटाते हैं ,
अनपढ़ असहाय और गरीबों को भी उनका अधिकार दिलाते हैं।
चलो फिर से नए जोश नए उल्लास से नववर्ष मनाते हैं,
रह गए थे जो सपने अधूरे अभी उन्हें फिर से सजाते हैं ।