मनुष्य के तीन मुख्य विक्षेप होते हैं- भय, दैन्य, दुःख।
- तन को मृत्यु का भय है।
- मन को मान की कमी है, न्यूनता है, निम्नता है, दैन्य है, अभाव है।
- प्राण को दोषों से दुःख की अनुभूति है।
यही तीन रोग हैं जो मनुष्य को आजीवन त्रस्त किये रहते हैं और तीन प्रकार की शंकाएं भी उत्पन्न करते रहते हैं।
इन तीनों ग्रंथियों से ग्रस्त हुआ मनुष्य कभी तृप्त तुष्ट शांत नहीं रह पाता। सदैव सशंकित और बेचैन रहता है।
यही तीनों ग्रंथियां आत्मा को आच्छादित करके मनुष्य को आत्महीन और अनीश्वर बना देती हैं।
ऐसा मनुष्य फिर जीवन भर ईशरत्व की, स्वामित्व की, मिल्कियत की खोज में लगा रहता है।
ऐसा विक्षिप्त मनुष्य ही अनुशासनहीन और विद्रोही प्रवृत्ति का हो जाता है।
ऐसा व्यक्ति निरन्तर दुःखी, दीन, भयभीत बना रहता है, हर क्षण इन्हीं तीनों बातों के प्रति सशंकित रहता है।
कभी सामान्य नहीं रह पाता।
तब वह मनुष्य इन्हीं तीनों ग्रंथियों को तृप्त करने में ही अपनी सारी सामर्थ्य का उपयोग करने को विवश होता है। उसकी क्रिया विचार इच्छा सब इन्हीं तीनों के इर्द गिर्द घूमती रहती हैं।
वह जीवन भर अपना दुःख मिटाने, अपना भय मिटाने, अपना अपमान मिटाने में लगा रहता है और जितनी भी दवा करता है उतना ही मर्ज अधिक बढ़ जाता है।
उपरोक्त तीनों विक्षेपों से स्थाई मुक्ति का उपाय ;
- निजी जीवनचर्या में सत्यनिष्ठ व सत्यानुशासित बनिये।
- पारिवारिक जीवनचर्या में प्रेमनिष्ठ व प्रेमानुशासित बनिये।
- सामाजिक/व्यवहारिक जीवनचर्या में न्यायनिष्ठ व न्यायानुशासित बनिये।
- समष्टिक (Hole Creation के लिए) जीवनचर्या में पुण्यनिष्ठ व पुण्यानुशासित बनिये।
पूर्ण व स्वस्थ मनुष्यता के लिए ज़ब भी कभी फुर्सत मिले यह ट्रीटमेंट अवश्य करिये।
राम गुप्ता, स्वतंत्र पत्रकार, नोएडा