विश्व पर्यावरण दिवस प्रतिवर्ष बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। सरकारी कार्यालयों, विद्यालयों, सामाजिक संस्थाओं और विभिन्न संगठनों द्वारा पौधारोपण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, समाचार पत्रों में रंगीन तस्वीरें प्रकाशित होती हैं और पर्यावरण संरक्षण के संकल्प लिए जाते हैं। किंतु प्रश्न यह है कि क्या पर्यावरण दिवस का उद्देश्य केवल एक दिन का आयोजन और प्रचार-प्रसार है, अथवा धरातल पर वास्तविक परिवर्तन लाना?
पर्यावरण दिवस की सार्थकता तभी सिद्ध होती है जब उसके परिणाम वर्षभर दिखाई दें। यदि लाखों पौधे लगाने के दावे किए जाएँ और कुछ महीनों बाद उनमें से अधिकांश सूख जाएँ, तो ऐसे अभियान केवल औपचारिकता बनकर रह जाते हैं। आज पृथ्वी का बढ़ता तापमान, अनियमित वर्षा, सूखा, बाढ़, भूजल का गिरता स्तर और वायु प्रदूषण इस बात के स्पष्ट संकेत हैं कि प्रकृति का संतुलन लगातार बिगड़ रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि स्वस्थ पर्यावरण के लिए प्रति व्यक्ति पर्याप्त वृक्षावरण आवश्यक है। भारत में बढ़ती जनसंख्या, तीव्र शहरीकरण और अवसंरचनात्मक विकास के कारण वृक्षों की संख्या लगातार घट रही है। एक ओर सड़कों, एक्सप्रेसवे, औद्योगिक परियोजनाओं और नगर विस्तार का जाल बिछ रहा है, वहीं दूसरी ओर हरित क्षेत्र सिकुड़ते जा रहे हैं। विकास आवश्यक है, किंतु ऐसा विकास जो प्रकृति को नष्ट कर दे, अंततः मानव सभ्यता के लिए ही संकट बन जाता है।
हरदोई जनपद इसका एक प्रत्यक्ष उदाहरण है। पिछले कुछ वर्षों में गंगा एक्सप्रेसवे तथा राष्ट्रीय राजमार्ग के निर्माण के लिए बड़ी संख्या में वृक्षों का कटान हुआ। नगर और ग्रामीण आबादी के विस्तार, कृषि भूमि के बढ़ते दबाव तथा औद्योगिक गतिविधियों ने भी वृक्षों की संख्या को प्रभावित किया है। यदि लाखों वृक्ष काटे जाते हैं तो यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि उनके स्थान पर वैज्ञानिक ढंग से उतनी ही संख्या में पौधे लगाए जाएँ और उनकी निगरानी भी सुनिश्चित की जाए। केवल पौधारोपण की संख्या बताना पर्याप्त नहीं है; वास्तविक सफलता उन पौधों के जीवित रहने में है।
पर्यावरण संकट का दूसरा बड़ा कारण प्लास्टिक प्रदूषण है। आज लगभग हर व्यक्ति यह जानता है कि प्लास्टिक पर्यावरण और जीव-जंतुओं के लिए घातक है। इसके बावजूद इसका उपयोग निरंतर बढ़ रहा है। सड़कों, नालों, खेतों और जलस्रोतों में प्लास्टिक का जमाव सामान्य दृश्य बन चुका है। हजारों मूक पशु प्रतिवर्ष प्लास्टिक निगलने के कारण असमय मृत्यु का शिकार हो जाते हैं। यदि प्लास्टिक वास्तव में हानिकारक है, तो उसके व्यवहारिक विकल्पों को व्यापक स्तर पर उपलब्ध कराना भी उतना ही आवश्यक है। केवल प्रतिबंध की घोषणाएँ समस्या का समाधान नहीं कर सकतीं।
जलस्रोतों की स्थिति और भी चिंताजनक है। भारत की पवित्र नदियाँ—गंगा, यमुना, गोमती, नर्मदा, क्षिप्रा और अनेक अन्य नदियाँ—प्रदूषण के गंभीर संकट से जूझ रही हैं। करोड़ों रुपये की योजनाओं और अभियानों के बावजूद अनेक नदियों की दशा अपेक्षित रूप से नहीं सुधर सकी है। औद्योगिक अपशिष्ट, घरेलू सीवेज और ठोस कचरा आज भी बड़ी मात्रा में नदियों में पहुँच रहा है। परिणामस्वरूप जल की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है और मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
पर्यावरण का सबसे महत्वपूर्ण आधार जल और जंगल हैं। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। जहाँ जल होगा, वहीं वनस्पति फलती-फूलती है और जहाँ वन होंगे, वहीं जल संरक्षण संभव होगा। इस दृष्टि से नदियाँ केवल जलधाराएँ नहीं, बल्कि संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र की जीवनरेखा हैं।
अवध क्षेत्र की सई नदी इसका अत्यंत मार्मिक उदाहरण प्रस्तुत करती है। श्रीरामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास ने भगवान श्रीराम की वनयात्रा का वर्णन करते हुए सई नदी का उल्लेख किया है। यह नदी केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर भी है। हरदोई जनपद की भिजवान झील से निकलकर यह नदी लखनऊ, उन्नाव, रायबरेली और प्रतापगढ़ होते हुए जौनपुर में गोमती नदी से मिलती है। लगभग 715 किलोमीटर की यात्रा करने वाली यह नदी अपने अद्भुत घुमावों, गहरे कुण्डों और भूजल पुनर्भरण की क्षमता के लिए जानी जाती रही है।
विडंबना यह है कि इतनी समृद्ध प्राकृतिक विशेषताओं वाली नदी आज अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। प्रदूषण, अतिक्रमण, जल दोहन और प्रशासनिक उपेक्षा ने इसकी जीवनदायिनी क्षमता को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। कई स्थानों पर यह नदी वर्ष के अधिकांश समय सूखी दिखाई देती है। यह केवल एक नदी की नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक संवेदनहीनता की कहानी है।
पिछले डेढ़ दशक से सई नदी के संरक्षण की माँग उठती रही है, परंतु अपेक्षित जनसहभागिता और संस्थागत प्रतिबद्धता का अभाव स्पष्ट दिखाई देता है। पर्यावरण संरक्षण किसी एक विभाग, संगठन या व्यक्ति का कार्य नहीं है। यह समाज, सरकार, उद्योग और नागरिकों—सभी की साझा जिम्मेदारी है।
हमें यह समझना होगा कि पर्यावरण की रक्षा केवल पौधे लगाने से नहीं होगी। जल संरक्षण, नदियों का पुनर्जीवन, प्लास्टिक का विकल्प, जैव विविधता का संरक्षण, वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण और जन-जागरूकता—इन सभी क्षेत्रों में समान रूप से कार्य करना होगा। प्रत्येक नागरिक यदि अपने जीवन में छोटे-छोटे परिवर्तन अपनाए तो उसका प्रभाव व्यापक हो सकता है।
आज आवश्यकता पर्यावरण पर भाषण देने की नहीं, बल्कि पर्यावरण के प्रति व्यवहार बदलने की है। यदि सरकार अपनी जवाबदेही सुनिश्चित करे, उद्योग पर्यावरणीय मानकों का पालन करें और नागरिक अपनी जिम्मेदारियाँ निभाएँ, तो स्थिति में सकारात्मक परिवर्तन संभव है। अन्यथा पर्यावरण दिवस केवल एक वार्षिक उत्सव बनकर रह जाएगा और प्रकृति का क्षरण निरंतर जारी रहेगा।
पर्यावरण का प्रश्न केवल पेड़ों, नदियों और जंगलों का नहीं है; यह मानव सभ्यता के भविष्य का प्रश्न है। यदि हमने समय रहते चेतना नहीं दिखाई, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें क्षमा नहीं करेंगी। पर्यावरण को बचाना किसी एक दिन का कार्यक्रम नहीं, बल्कि जीवनभर निभाया जाने वाला दायित्व है।
–डॉक्टर राघवेन्द्र कुमार राघव (हरदोई)